शाह की छवि बदलने का समय

ऐसा लग रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की छवि बदलने और उनको बड़े रोल के लिए तैयार करने का समय आ गया है। यह एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है, जो भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में दशकों से चल रही है। एक नेता जो शीर्ष पर होता है उसे उदारवादी छवि दी जाती है। थोड़े समय के बाद नंबर दो नेता की वैसी ही छवि गढ़ी जाती है और उस बीच तीसरे नंबर पर कोई न कोई बाज नेता खड़ा किया जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय बाज नेता आडवाणी थे। आडवाणी के समय वह जगह नरेंद्र मोदी को मिली। नरेंद्र मोदी के समय वह जगह अमित शाह की है और उनकी जगह योगी आदित्यनाथ की होगी। यह एक सनातन चक्र है।

यह चक्र अब शुरू हो गया है। पिछले साल अमित शाह ने एक झटके में सारे काम निपटा दिए। कश्मीर से लेकर नागरिकता कानून तक सारे टंटे खत्म हो गए। अब उनको नई छवि में आना है। इसका पहला संकेत उनके हाल में दिए गए पहले इंटरव्यू से मिला है। उन्होंने रिलायंस समूह के चैनल को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में तमाम विवादित मसलों पर बहुत बेबाक राय रखी है। मजेदार बात यह है कि हर मसले पर उनकी राय उनके और भाजपा के सनातन विरोधियों से मिलती-जुलती है। उन्होंने वहीं बात कही, जो इस देश के उदार, प्रगतिशील लोग कह रहे थे और सरकार से भी सुनने चाहते थे।

अमित शाह ने सबसे पहले महाराष्ट्र के राज्यपाल की ओर से मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को लिखी चिट्ठी के कंटेंट को खारिज किया। मुख्यमंत्री को सेकुलर बता कर उन पर किए तंज को उन्होंने खारिज किया और कहा कि राज्यपाल को अपने शब्दों का चयन सोच समझ कर करना चाहिए। यह बड़ी बात थी क्योंकि राज्यपाल की लिखी चिट्ठी का प्रदेश भाजपा के नेता बचाव कर रहे थे। इसके बाद अमित शाह ने हिंदी फिल्मों के अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को लेकर मीडिया में लगातार चली खबरों पर बेबाक राय दी और कहा कि टीआरपी की भूख में ऐसा किया गया। भाजपा के खास माने जाने वाले पत्रकार के चैनल ने ही सबसे ज्यादा इस मामले को तूल दिया था।

केंद्रीय गृह मंत्री ने टाटा समूह के आभूषण ब्रांड तनिष्क के एक विज्ञापन को लेकर हुए विवाद को भी खारिज किया। इसमें एक हिंदू युवती को मुस्लिम परिवार की बहू के तौर पर दिखाया गया था, जिसे लेकर कट्टरपंथी हिंदू समूहों और सामान्य लोगों ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी थी। अमित शाह ने इस विवाद को खारिज करते हुए ऐसे मामलों में ‘ओवर एक्टिविज्म’ यानी अतिरिक्त क्रांतिकारिता की जरूरत नहीं है। इन तीनों मसलों पर उनकी राय आगे की उनकी राजनीति के बारे में बताने वाली है।

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