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राजरंग| नया इंडिया|

केजरीवाल को विकल्प बनाने की तैयारी

अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी अलग विपक्षी राजनीति में अपनी जगह बनाने के प्रयास में लगी है। किसान आंदोलन का समर्थन और किसानों की मदद करने से लेकर भाजपा और केंद्र सरकार के साथ लगातार टकराव के जरिए उन्होंने अपनी जगह बनाने का प्रयास किया है। हालांकि अपनी राजनीति के जरिए वे बार बार भाजपा की बी टीम होने का संकेत देते हैं फिर भी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सरकार के अधिकार छीन कर उप राज्यपाल को देने वाला बिल पास होने के बाद से उनका टकराव बढ़ा है। यह हकीकत है कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में अगर उनकी पार्टी ठीक-ठाक प्रदर्शन करती है और अगले साल के दिल्ली नगर निगम चुनाव में जीतती है तो केजरीवाल की दावेदारी को गंभीरता से लेना होगा। नगर निगम की पांच सीटों के उपचुनाव में चार पर जीत हासिल कर आम आदमी पार्टी ने अपनी ताकत दिखाई है।

ध्यान रहे केजरीवाल की पार्टी पोस्ट आईडियोलॉजी यानी उत्तर विचारधारा की राजनीति का प्रतिनिधित्व करती है, जिसकी बुनियाद गवर्नेंस पर है। गवर्नेंस के अपने मॉडल का प्रचार केजरीवाल बेहतर ढंग से कर सकते हैं, गुजरात मॉडल से भी बेहतर। सो, अगले तीन साल उनकी राजनीति के लिए बहुत अहम हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्यों का चुनाव आम आदमी पार्टी के लिए टेक ऑफ का जरिया बन सकता है। इन राज्यों में आप के नेता मेहनत भी कर रहे हैं। इसके अलावा केजरीवाल कई पार्टियों के साथ तालमेल बनाए हुए हैं। ममता बनर्जी के साथ उनका संपर्क है और ममता हर मसले पर उनका साथ देती हैं। उन्होंने विपक्षी एकजुटता के लिए जिन नेताओं को चिट्ठी लिखी उसमें केजरीवाल भी हैं। ऐसा लग रहा है कि अगले तीन साल केजरीवाल केंद्र के साथ टकराव बढ़ाएंगे। अगर अधिकारों के मामले में सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिलती है तो इस्तीफा देकर फिर चुनाव में जाने का दांव भी चल सकते हैं।

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