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आसू का आंदोलन भाजपा को भारी पड़ेगा

ऑल असम स्टूडेंट यूनियन यानी आसू ने अपना अराजनीतिक संगठन होने का चोगा उतार दिया है। वह खुल कर सक्रिय राजनीति में है। उसने असम जातीय परिषद के नाम से पार्टी बनवाई है, जो अखिल गोगोई की पार्टी रायजोर दल के साथ मिल कर विधानसभा का चुनाव लड़ रही है। इन दोनों पार्टियों का मुख्य फोकस नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए के विरोधी वोट को एकजुट करने पर है। एक तरफ ये पार्टियां हैं, जो सीएए को मुद्दा बनाए रखना चाहती हैं तो दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी है, जो सीएए लेकर आई है लेकिन उसे मुद्दा नहीं बनने देना चाहती है क्योंकि इससे उसे नुकसान का अंदेशा है। यह भाजपा की सदिच्छा है कि सीएए का मुद्दा नहीं बने। तभी भाजपा के नेता बार बार कह रहे हैं कि सीएए मुद्दा नहीं है।

उनके कहने के हिसाब से ही मीडिया में भी यह दिखाया जा रहा है कि सीएए कोई मुद्दा नहीं है। पर असल में सीएए मुद्दा है। कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से यह मुद्द हाशिए में चला गया था और आंदोलन ठंड़ा पड़ गया था पर लेकिन आसू ने इसे फिर से धार दी है। आसू ने पूरे प्रदेश में सीएए पर आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया है। 20 मार्च को आसू ने पूरे प्रदेश में मोटरसाइकिल रैली निकालने का ऐलान किया है। ध्यान रहे असम में पहले चरण का चुनाव 27 मार्च को है। उस दिन तक आसू का प्रयास सीएए को फिर से मुद्दा बना देने का है। कांग्रेस चुपचाप तमाशा देख रही है क्योंकि उसको पता है कि सीएए विरोध का वोट एकजुट हुआ तो उसको भी फायदा हो सकता है। उसमें नुकसान सिर्फ भाजपा का होगा।

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