राजनीति

पूर्वोत्तर की चिंता में हिमंता को कमान

छह साल पहले कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में शामिल हुए हिमंता बिस्वा सरमा को असम का मुख्यमंत्री बनाने का फैसला भाजपा के लिए आसान नहीं था। भाजपा ने वैचारिक प्रतिबद्धता की कसौटी को किनारे करके सरमा को मुख्यमंत्री बनवाया। भाजपा नेताओं को पता है कि सरमा की एकमात्र प्रतिबद्धता मुख्यमंत्री की कुर्सी है। आज वे भले बदरूद्दीन अजमल को गालियां देते हैं और उनके नाम पर ध्रुवीकरण की राजनीति करते हैं लेकिन एक समय था, जब कांग्रेस में रहते हुए हिमंता बिस्वा सरमा ने अजमल के साथ मिल कर तब के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई की सत्ता पलटने का खेल रचा था। यह अलग बात है कि उसमें उनको सफलता नहीं मिली थी।

सो, सरमा की वैचारिक प्रतिबद्धता और कुर्सी के लिए उनके मोह के बारे में जानते हुए भी भाजपा आलाकमान ने उनको मुख्यमंत्री बनवाया तो इसका कारण मजबूरी है। असम की भी मजबूरी और समूचे पूर्वोत्तर की चिंता में पार्टी ने उनको राज्य की कमान सौंपी है। जानकार सूत्रों का कहना है कि इस बार सरमा मुख्यमंत्री से कम किसी चीज पर राजी नहीं होने वाले थे। उन्होंने विधानसभा का चुनाव इसी शर्त पर लड़ा था कि चुनाव के बाद वे मुख्यमंत्री बनेंगे। अन्यथा उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया था और भाजपा को पता था कि वे चुनाव नहीं लड़ते तो असम जीतना मुश्किल था।

बहरहाल, हिमंता को भाजपा के ज्यादातर विधायकों का समर्थन हासिल था और साथ ही दोनों सहयोगी पार्टियों असम गण परिषद और यूपीपीएल का भी पूरा समर्थन उनको था। असल में इन दोनों पार्टियों को लग रहा है कि हिमंता के मुख्यमंत्री रहते वे ज्यादा स्वतंत्र रूप से काम कर सकेंगे। तभी एनडीए के 75 विधायकों में से 60 के करीब विधायकों ने हिमंता का समर्थन किया था। इस बार विधानसभा की स्थिति ऐसी थी कि मामूली टूट-फूट में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बन सकती थी। एक बार अगर हिमंता नाराज होते और राज्य में भाजपा की सरकार नहीं बनती तो पूर्वोत्तर के हर राज्य में भाजपा को दिक्कत आती। इसलिए भाजपा आलकमान ने जोखिम नहीं लिया।

अगले साल के शुरू में ही मणिपुर में विधानसभा का चुनाव होने वाला है। भाजपा को वहां अपनी सरकार बचानी है। पिछले दिनों त्रिपुरा और मेघालय में स्थानीय चुनावों में भाजपा को जैसा झटका लगा है उससे पार्टी के नेता अपने प्रदर्शन को लेकर आशंकित हैं। अगले साल के चुनाव में मणिपुर बचाने की एकमात्र उम्मीद हिमंता बिस्वा सरमा हैं। उसके अगले साल तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा को पता है कि सर्बानंद सोनोवाल के वश में नहीं है कि वे पार्टी को पूर्वोत्तर में मजबूती से टिकाए रखें। पूर्वोत्तर में भाजपा का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि सरमा किस तरह से राजनीतिक हैंडल करते हैं।

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