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भाजपा ने अपना नुकसान खुद किया!

एक्जिट पोल के नतीजे भले पूरी तरह से सही नहीं होते हैं पर उनसे नतीजों की दिशा का अनुमान लग जाता है। वह भी अगर सारे एक्जिट पोल एक जैसा अनुमान जता रहे हैं तो गलती की गुंजाइश बिल्कुल नहीं रह जाती है। सो, यह तय लग रहा है कि दिल्ली में फिर से आम आदमी पार्टी की सरकार बनने जा रही है। जिस समय चुनाव शुरू हुआ था उसी समय यह स्थिति दिख रही थी। वह तो शाहीन बाग का आंदोलन था, जिसकी वजह से भाजपा कम से कम प्रचार के दौरान लड़ाई में दिखी। तभी सवाल है कि क्या भाजपा को दीवार लिखी हुई यह इबारत नहीं दिख रही थी? क्यों उसने नरेंद्र मोदी को दांव पर लगाया? क्यों दर्जनों मंत्रियों को चुनावी प्रबंधन में लगाए रखा और ढाई सौ सांसदों को दिल्ली के लोगों के बीच जाने और डोर टू डोर कैंपेन करने को कहा?

अगर भाजपा के नेता दिल्ली के लोगों का मूड नहीं भांप पाए तो यह बड़ी विफलता है लेकिन अगर मूड भांपने के बाद इतना सब कुछ दांव पर लगाया तो यहीं कहा जा सकता है कि पार्टी ने जान बूझकर भद्द पिटवाई है। भाजपा के ही जानकार नेता कह रहे हैं कि देश भर के सांसदों और नेताओं को प्रचार में उतारने की बजाय अगर पार्टी दिल्ली के पुराने नेताओं को कमान सौंपती तो ज्यादा बेहतर होता। दिल्ली में भाजपा के पास विजय गोयल जैसे नेता हैं, जो लगातार जमीन पर लड़ते रहे हैं। डॉक्टर हर्षवर्धन हैं, जो कभी दिल्ली में चुनाव नहीं हारे। पहली बार उनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार बना कर भाजपा दिसंबर 2013 में लड़ी थी तब पार्टी ने 31 सीटें जीती थीं। भाजपा के पास प्रवेश वर्मा और रमेश विधूड़ी जैसे जाट और गूजर नेता भी दिल्ली में हैं।

इनकी बजाय भाजपा ने कमान मनोज तिवारी को देकर पहली रणनीतिक गलती की। इसकी बजाय पार्टी को बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ बड़े नेताओं से ज्यादा प्रचार कराने की रणनीति पर काम करना चाहिए था। भाजपा अगर अपने पारंपरिक वोट बैंक को फोकस करके प्रचार करती तो शायद उसके लिए नतीजे बेहतर होते। पर वह शुरू से एक के बाद एक गलती करती गई। तभी सवाल है कि इतनी गलतियां क्यों हुईं, जबकि अमित शाह खुद चुनाव की डोर संभाले हुए थे? उनका रिकार्ड इस तरह की रणनीतिक गलतियों वाला नहीं रहा है।

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