सरकार व संघ को क्या पहले से पता था? - Naya India
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सरकार व संघ को क्या पहले से पता था?

केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को क्या पहले से पता था कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला महीने के दूसरे शनिवार को यानी नौ नवंबर को आना है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि सरकार, संघ और भारतीय जनता पार्टी की ओर से फैसले के बाद के हालात से निपटने की तैयारी एक हफ्ते से शुरू हो गई थी। दूसरी ओर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस की तैयारी यह मान कर हो रही थी कि फैसला चीफ जस्टिस के रिटायर होने वाले दिन से ठीक पहले आएगा। तभी कांग्रेस ने कार्यसमिति की बैठक रविवार को बुलाई थी। उनको अंदाजा था कि फैसला इसके बाद ही आएगा। पर सरकार की तैयारी पहले से चल रही थी।

ध्यान रहे राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने आरएसएस के स्वंयसेवकों से करीब एक हफ्ते पहले ही अपील कर डाली थी कि वे शांति बनाए रखें और किसी तरह का जश्न न मनाएं। यहीं बात भाजपा की ओर से अपने कार्यकर्ताओं को कही गई। पार्टी के सभी प्रवक्ताओं से लेकर दूसरे नेताओं को इस बारे में पहले ही ब्रीफ किया जा चुका है कि उन्हें इस पर किस तरह की प्रतिक्रिया देनी है।

इसी तरह सरकार की ओर से भी तैयारियां पहले ही शुरू हो गई थीं। पुलिस बल की तैनाती की जाने लगी थी और प्रशासन को चौकस कर दिया गया था। इससे ऐसा लग रहा है कि सरकार को, सत्तारूढ़ दल और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ को इस बात का अंदाजा था कि फैसला बताए जा रहे समय से पहले ही आ सकता है। उनको संभवतः इस बात का भी अंदाजा था कि फैसला क्या आना है, तभी उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया था कि वे अदालत का फैसला मानेंगे। इससे पहले वे कहते रहे थे कि राम मंदिर का मामला आस्था का मामला है और अदालत इस पर फैसला नहीं सुना सकती है।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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