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बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ की छह साला हकीकत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनवरी 2015 में बड़े फैनफेयर के साथ बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की शुरुआत की थी। वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की इस साल की रिपोर्ट से छह साल पुरानी इस योजना की हकीकत जाहिर हुई है। आर्थिक मामलों की दुनिया सर्वाधिक सम्मानित संस्थाओं में से एक वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम ने इस साल की लैंगिक समानता की अपनी रिपोर्ट में 156 देशों की सूची में भारत को 140वें स्थान पर रखा है। भारत की रैंकिंग में एक साल में 20 स्थान की गिरावट हुई है। भारत की सबसे बुरी स्थिति लिंग अनुपात और महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर है। इस मामले में भारत 156 देशों की सूची में 155वें स्थान पर है। भारत से नीचे सिर्फ चीन है। ध्यान रहे लिंग अनुपात सुधारने के लिए ही बुनियादी रूप से इस अभियान को शुरू किया गया था लेकिन जाहिर है कि दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले भारत में इसमें कोई सुधार नहीं हुआ है।

बहरहाल, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की रिपोर्ट के मुताबिक लैंगिक समानता, महिलाओं के अधिकार, सरकार से लेकर राजनीति तक में उनकी भागीदारी के मामले में भारत दक्षिण एशिया के देशों में भी सबसे फिसड्डी है। भारत का स्थान बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल और यहां तक कि म्यांमार से भी नीचे है। सरकार में शामिल महिला मंत्रियों के मामले में 2019 में भारत की स्थिति कुछ बेहतर थी और 23.1 फीसदी हिस्सेदारी थी, जो पिछले साल गिर कर 9.1 फीसदी पर पहुंच गई है। सो, चाहे लिंग अनुपात हो, महिला स्वास्थ्य हो, स्त्री मृत्यु दर हो, नौकरी और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी का मामला हो, सबमें भारत का स्थान बहुत नीचे है। वैसे भी छह साल पहले शुरू हुए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान की अब चर्चा नहीं होती है।

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