टेलीविजन चैनलों पर बड़ा सवाल है

केंद्र सरकार के श्रम व नियोजन मंत्रालय ने मॉनसून सत्र के पहले दिन लिखित जवाब में बता दिया कि उसके पास प्रवासी मजदूरों का डाटा नहीं है। अब बड़ा सवाल टेलीविजन चैनलों से पूछा जाना चाहिए कि फिर उन्होंने किस आधार पर मजदूरों के पलायन के समय बढ़-चढ़ कर दावे किए थे किए कितने मजदूरों को क्या सुविधा दी जा रही है? राज्य सरकारों से भी पूछा जाना चाहिए कि जब डाटा जुटाया ही नहीं गया तो उन्होंने मजदूरों को सुविधा देने के जो वादे किए, वह किस चीज पर आधारित था। और अगर टेलीविजन चैनलों और राज्य सरकारों के पास आंकड़ा है तो वे केंद्र सरकार या जनता के सामने पेश क्यों नहीं कर रहे हैं?

एक सवाल यह भी है कि सरकार कहीं झूठ तो नहीं बोल रही है? आखिर अप्रैल के महीने से ही सरकार दावा कर रही है कि भारतीय रेलवे ने इतनी बड़ी संख्या में लोगों को उनके घर पहुंचाया है और वह भी मुफ्त में। अगर रेलवे के पास लोगों का आंकड़ा है तो उसको यह भी पता होगा कि ट्रेन में सफर के दौरान क्या क्या गड़बड़ियां हुईं और कितने लोग मर गए! इसी तरह दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश आदि राज्यों की सरकारों ने दावा किया कि उन्होंने कितने करोड़ मजदूरों की आर्थिक मदद की और कितने करोड़ मजदूरों के लिए रास्ते में भोजन की व्यवस्था की।

ये सारी खबरें टेलीविजन चैनलों पर चलीं हैं कि कितने लाख मजदूर ट्रेनों से गए तो कितने करोड़ मजदूरों को आर्थिक मदद मिली और कितने करोड़ मजदूरों को खाना खिलाया गया है, चप्पलें दी गईं, बसों में बैठा कर घर पहुंचाया गया। सो, सरकार चाहती तो आसानी से इस बारे में आकंड़े जुटा कर संसद में पेश कर सकती थी। पर उसने तो अपनी रणनीति के तहत संसद को आंकड़ा नहीं दिया पर चैनलों ने जिन आंकड़ों के आधार पर सरकार के कामकाज का गुणगान किया था उन्हें तो सफाई देनी चाहिए।

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