बिहार चुनाव तक यही रवैया रहेगा

भड़काऊ भाषणों पर अमित शाह के बयान और जेपी नड्डा द्वारा गिरिराज सिंह को फटकार लगाने की दो घटनाओं का एक कारण बिहार चुनाव भी लग रहा है। भाजपा को दिल्ली में हुए नुकसान का तो अंदाजा हो ही गया है, अब उसे बिहार में नीतीश कुमार के साथ चुनाव लड़ना है। वहां किसी हाल में नीतीश कुमार भड़काऊ भाषणों का एजेंडा नहीं चलने देंगे। ध्यान रहे उन्होंने संशोधित नागरिकता कानून का समर्थन किया है पर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का खुल कर विरोध कर चुके हैं। उन्होंने राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में भी माता-पिता के बारे में सूचना मांगने के प्रावधान का विरोध किया है। तभी ऐसा लग रहा है कि बिहार चुनाव तक भाजपा के तेवर ऐसे ही रहेंगे। तभी देवबंद पर दिए बयान के बहाने बिहार के सबसे फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह को पहले ही चुप करा दिया गया है।

असल में भाजपा के शीर्ष नेता एक के बाद एक राज्यों की सत्ता गंवाने से चिंता में हैं। पिछले डेढ़ साल में पांच बड़े राज्यों- मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, महाराष्ट्र और झारखंड की सत्ता उसके हाथ से निकली है। दिल्ली में उसकी करारी हार हुई है और हरियाणा में भी झटका लगा है। अब उसके नेता नहीं चाहते कि बिहार की सत्ता भी हाथ से निकले। भाजपा को पता है कि बिहार में नीतीश के साथ लड़े बगैर चुनाव जीतना संभव नहीं है। भाजपा पहले एक बार बगैर नीतीश के चुनाव लड़ कर अपनी ताकत आजमा चुकी है।

तभी पार्टी के प्रदेश के तमाम नेताओं के बड़े बड़े दावों के बावजूद पार्टी ने ऐलान कर दिया है कि नीतीश कुमार को सीएम का चेहरा पेश करके ही चुनाव लड़ना है। भाजपा को यह भी लग रहा है कि बिहार में भी चुनाव हारे तो अगले साल पश्चिम बंगाल और असम की लड़ाई और मुश्किल होगी। कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए हार का सिलसिला तोड़ना जरूरी है। तभी पार्टी नेताओं के सुर बदले हुए हैं।

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