बाहर से लौटे मजदूरों की चिंता

बिहार में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव नहीं कराने के पक्ष में भाजपा नेताओं ने प्रवासी मजदूरों का भी तर्क दिया है। भाजपा नेताओं ने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को बताया है कि दिल्ली, मुंबई सहित देश के ज्यादातर हिस्सों से जो प्रवासी मजदूर लौटें हैं, वे अभी बिहार में ही हैं। बड़ी मुश्किल से पांच-दस फीसदी मजदूर वापस लौटें हैं। तमाम किस्म की मुश्किलें झेल कर जो मजदूर वापस लौटे हैं, उनमें बहुत गुस्सा है। वे आर्थिक रूप से तो तबाह हुए ही हैं, उन्हें जो शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है वह अभूतपूर्व है।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कोरोना संकट के बीच में मजदूरों की वापसी का विरोध किया था। वे नहीं चाहते थे कि मजदूर वापस लौटें। उत्तर प्रदेश सरकार ने विशेष बसों से मजदूरों को बुलाना शुरू किया तो नीतीश कुमार ने उसका भी विरोध किया। उन्होंने इसे केंद्र के निर्देशों का उल्लंघन बताया। सोचें, केंद्र में भाजपा की सरकार है और भाजपा की ही एक राज्य सरकार अपने मजदूरों को वापस ला रही थी तो सबसे ज्यादा तकलीफ जदयू के नीतीश कुमार को हुई थी। इसका कारण यह था कि इससे उनके ऊपर दबाव बन रहा था कि वे भी मजदूरों को बुलाएं, जबकि वे कोरोना और चुनाव की चिंता में मजदूरों से अपील कर रहे थे कि वे जहां हैं वहीं रहें।  नीतीश कुमार ने राजस्थान के कोटा में पढ़ने वाले बच्चों की वापसी का भी विरोध किया था। ध्यान रहे कोटा में सबसे ज्यादा बच्चे बिहार के ही पढ़ते हैं। ज्यादातर बच्चे मध्य वर्ग के और सवर्ण समाज के हैं। इसलिए जदयू और भाजपा पर दोहरी मार पड़ी है। मजदूर तबका भी नाराज हुआ तो मध्य वर्ग में भी गुस्सा बढ़ा। तभी भाजपा को लग रहा है कि बाहर से लौटे मजदूर अपना गुस्सा जाहिर करने के लिए सरकार के खिलाफ वोट कर सकते हैं और जदयू-भाजपा का अपना कोर वोट बैंक नाराजगी जाहिर करने के लिए भी घर में बैठ सकता है।

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