एनडीए की नहीं, भाजपा की रैली

बिहार चुनाव के लिए प्रधानमंत्री की रैलियों की घोषणा हुई थी तो बताया गया था कि वे 12 रैलियां करेंगे और हर रैली एनडीए की रैली होगी। साफ तौर पर कहा गया था कि यह भाजपा की नहीं, बल्कि एनडीए की रैलियां होंगी। इससे जदयू के नेता खुश थे। उनको लग रहा था कि एनडीए की रैली होगी तो अपने आप भाजपा के कार्यकर्ताओं को सिगनल होगा और आम मतदाता के दिमाग से भी कंफ्यूजन निकलेगा। प्रधानमंत्री की पहली रैली के लिए सासाराम का चुनाव भी अच्छा था क्योंकि इस इलाके में लगभग सभी सीटों पर जदयू लड़ रही है और उसके खिलाफ चिराग पासवान ने लोजपा के उम्मीदवार उतारे हैं। सो, लगा था कि इस जगह का चुनाव रणनीतिक रूप से किया गया है।

परंतु जदयू के नेता जैसा सोच रहे थे सब कुछ उसके उलटा हो गया। रैली पूरी तरह से भाजपा की हो गई। जदयू बिल्कुल हाशिए में चली गई। इसके लिए जदयू के नेता भी जिम्मेदार हैं, जिन्होंने इस बात के लिए जोर नहीं लगाया कि उनके समर्थक अपना झंडा-बैनर लेकर रैली में पहुंचें। इसका नतीजा यह हुआ कि चारों तरफ सिर्फ भाजपा के झंडे और कमल का निशान दिख रहा था। वोट अगर तीर के निशान पर डलवाना है तो चारों तरफ उसके झंडे होने चाहिए थे पर ऐसा नहीं था।

मंच के ऊपर भी भाजपा की ही झंडा लगा था और माइक के सामने भाजपा का चुनाव चिन्ह था और प्रधानमंत्री के कुर्ते पर कमल का निशान बना हुआ था। रोहतास जिले में वोट डलवाना है कि तीर के निशान पर लेकिन चारों तरफ कमल की निशान दिख रहा था। इतना ही नहीं प्रधानमंत्री ने जो बातें कहीं वह भी सब भाजपा को लेकर थीं। उन्होंने नीतीश कुमार के कामकाज के बारे में नहीं बताया। भाजपा और केंद्र की सरकार क्या कर रही है और क्या किया है, इसके बारे में प्रधानमंत्री ज्यादा बोले।

प्रधानमंत्री के भाषण में स्वाभाविक ऊर्जा और जोश की कमी थी, जिसके बारे में भाजपा नेताओं की सफाई है कि नवरात्रि के व्रत चल रहे हैं और प्रधानमंत्री उपवास पर हैं। यह भी लोगों ने मार्क किया कि प्रधानमंत्री की बढ़ी हुई दाढ़ी और बढ़े हुए बाल से उनका व्यक्तित्व पूरी तरह से बदल गया है। वे ज्यादा बूढ़े और कमजोर दिखाए दिए। हो सकता है कि पश्चिम बंगाल में उनको इस लुक का फायदा मिले पर बिहारी लोगों को उनका पुराना लुक और आक्रामक तेवर ज्यादा अच्छा लगता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares