एनडीए में सीट बंटवारा आसान नहीं

बिहार में जनता दल यू और भाजपा के नेता भले कहें कि दोनों पार्टियों के बीच सब कुछ पहले से तय हो गया है, सीटों का बंटवारा हो गया है और जल्दी ही इसकी घोषणा कर दी जाएगी पर असलियत यह है कि एनडीए की तीनों पार्टियों के बीच सीटों का बंटवारा आसान नहीं है। भाजपा के तमाम प्रयासों के बावजूद जदयू नेताओं को इस बात की चिंता है कि भाजपा चुनाव के बाद तेवर बदल सकती है। इसलिए वे जरूरी मान रहे हैं कि जदयू ज्यादा सीट लड़े ताकि ज्यादा सीट जीत सके। उनको अंदेशा है कि अगर भाजपा ज्यादा सीट जीत गई तो वह मुख्यमंत्री पद के बंटवारे की मांग कर सकती है, जैसा कि महाराष्ट्र में शिव सेना ने किया था। जदयू नेताओं को अंदेशा है कि बराबर सीटें लड़ने पर भाजपा को ज्यादा सीट आएंगी। ध्यान रहे 2010 के चुनाव में जदयू 143 सीटों पर लड़ कर 116 जीती थी, जबकि भाजपा सौ सीट लड़ कर 91 जीती थी।

तभी जदयू ने सवा सौ सीटों की दावेदारी रखी है। उसके हिसाब से भाजपा को 90 और लोजपा को बची हुई 28 सीटों पर लड़ना चाहिए। दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि उसने लोकसभा चुनाव में अपनी जीती हुई सीटें छोड़ कर जदयू से बराबरी का समझौता किया था, जबकि इस बार जदयू को सीटें भी नहीं छोड़नी है। उसने राजद के साथ समझौते में 2015 में एक सौ सीटों पर चुनाव लड़ा था। इसलिए वह एक सौ सीटों पर लड़े। लोक जनशक्ति पार्टी के नेता चिराग पासवान अलग पूरे प्रदेश की राजनीति में लगे हैं। वे अपनी छह लोकसभा सीटों के हिसाब से कम से कम 36 सीटें चाहते हैं। जदयू के नेता समझौते की टेबल पर बैठेंगे तो उनका बॉटम लाइन यानी सबसे निचला स्तर 115 सीटों का है। इस फार्मूले में लोजपा को 35 और 93 सीटें भाजपा को मिलनी है। सोचें, अगर एनडीए की किसी पार्टी ने महागठबंधन के जीतन राम मांझी को भी अपनी तरफ लाने का दांव चला तो सीटों का बंटवारा कैसे होगा?

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