प्रशांत किशोर क्या कर रहे हैं? - Naya India
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प्रशांत किशोर क्या कर रहे हैं?

देश के नंबर एक चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर के अपने राज्य में चुनाव हो रहा है और उनका कहीं अता-पता नहीं है। बिहार में और बिहार से बाहर भी लोग पूछ रहे हैं कि वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं? इसका जवाब है कि वे पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और तमिलनाडु में डीएमके का चुनाव प्रबंधन संभाल रहे हैं। पिछले महीने वे ज्यादातर समय चेन्नई में डेरा डाले रहे क्योंकि पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा की वजह से राजनीतिक कामकाज ठप्प था। तृणमूल कांग्रेस के भी सारे नेता पूजा में व्यस्त थे। ध्यान रहे इन दोनों राज्यों में अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा का चुनाव होना है।

अब सवाल है कि 2015 में राजद और जदयू गठबंधन का पूरा चुनाव प्रबंधन संभालने वाले प्रशांत किशोर पूरी तरह से बिहार चुनाव से बाहर क्यों हो गए? तो इसका जवाब है कोरोना वायरस की वजह से। अगर मार्च में कोरोना वायरस की महामारी नहीं फैली होती तो प्रशांत किशोर बिहार में सक्रिय होते। वायरस की महामारी शुरू होने से ठीक पहले उन्होंने ‘बात बिहार की’ अभियान शुरू किया था। उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस करके बिहार की बदहाली और उसे इस हाल में पहुंचाने में भाजपा और जदयू की भूमिका का आंकड़ों के साथ खुलासा किया था।

मार्च से पहले प्रशांत किशोर कई किस्म के प्रयोग में लगे थे। कहा जा रहा है कि प्लूरल्स पार्टी की पुष्पम प्रिया चौधरी को सलाह दे रहे थे। इसके अलावा उन्होंने तेजस्वी यादव और चिराग पासवान को साथ लाने का भी प्रयास किया था। लेकिन मार्च में कोरोना फैलने और उसके बाद लागू लॉकडाउन की वजह से उनका सारा अभियान पटरी से उतर गया। लेकिन कहा जा रहा है कि बंगाल और तमिलनाडु चुनाव के बाद वे फिर बिहार में सक्रिय होंगे और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए नए समीकरण बनाने के काम में जुटेंगे। उनका लक्ष्य भाजपा का रथ रोकना होगा।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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