नीतीश की इंजीनियरिंग काम करेगी या नहीं?

बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार सोशल इंजीनियरिंग में माहिर नेता हैं। उन्होंने अपने छोटे से वोट आधार को बहुत बड़े जनादेश में तब्दील किया हुआ है। बिहार जैसे जाति से प्रभावित होने वाले राज्य में नीतीश कुमार अपनी जाति को दो-तीन फीसदी वोट के आधार पर पिछले 15 साल से सरकार में हैं। उन्होंने अपनी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर अपनी कुर्मी जाति के साथ धानुक और कोईरी दो जातियों को जोड़ा है और साथ साथ अति पिछड़ा और महादलित का कार्ड खेल कर बिहार की सबसे कमजोर जातियों को एक प्लेटफॉर्म दिया।

इस बार भी वे इसी सोशल इंजीनियरिंग के आधार पर चुनाव जीतने की रणनीति बना रहे हैं। असल में नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा छोड़ दी है। अब उनका प्रयास किसी तरह से पांच साल और मुख्यमंत्री बने रहने का है। तभी उन्होंने भाजपा के साथ ही बने रहने फैसला किया है। अगर भाजपा खुद अपनी ओर से चल कर उनको नहीं छोड़ती है तो इसके साथ ही रहेंगे। उनको भरोसा है कि कुर्मी-धानुक-कोईरी और अति पिछड़ा, महादलित के वोट के साथ भाजपा का सवर्ण और वैश्य वोट जुड़ जाएगा तो जीत की गारंटी होती है। इसलिए वे इस सोशल इंजीनियरिंग को आगे बढ़ाएंगे। पर अगर राजद, कांग्रेस और रालोसपा का तालमेल होता है और प्रशांत किशोर इस गठबंधन का चुनाव प्रबंधन संभालते हैं तो लड़ाई बहुत आसान नहीं रह जाएगी क्योंकि भाजपा की ओर से लगातार पिछड़ा नेतृत्व आगे करने से सवर्ण मतदाता कांग्रेस का भी रुख कर सकते हैं और पिछड़े व मुस्लिम वोटों की गोलबंदी राजद के साथ भी हो सकती है।

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