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नीतीश की राजनीति से भाजपा की सीख

लालू प्रसाद, राबड़ी देवी और नीतीश कुमार के अभी तक के 32 साल के राज में बिहार का चाहे जो भी बना हो लेकिन राजनीतिक प्रयोग बहुत हुए हैं। कई राजनीतिक प्रयोग तो ऐसे हैं, जिन्हें देश भर में अलग अलग तरह से लागू किया गया। बिहार की कुछ योजनाएं भी राष्ट्रीय स्तर पर लागू हुईं लेकिन उनकी संख्या कम है और राजनीतिक प्रयोगों की संख्या ज्यादा है। सरकारी योजनाओं की बात करें तो ‘हर घर नल से जल’ योजना नीतीश कुमार से शुरू की थी, जिसे केंद्र सरकार ने अपनाया है। नीतीश कुमार इस पर बहुत गर्व करते हैं और बार बार कहते हैं कि केंद्र सरकार चाहती थी कि बिहार अपनी योजना को केंद्र वाली योजना में मिला दे लेकिन उन्होंने इसकी इजाजत नहीं दी।

बहरहाल, उनका एक और बड़ा राजनीति प्रयोग थी पसमांदा मुसलमानों को अलग पहचान देकर उनकी राजनीति करने का। नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ रहते हुए बड़ी सफलता के साथ इस योजना पर अमल किया। अब भाजपा इस योजना पर बड़े पैमाने पर अमल करने जा रही है। रविवार को इसकी शुरुआत उत्तर प्रदेश में हो गई है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पसमांदा बुद्धिजीवी सम्मेलन किया है। ध्यान रहे पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत पांच मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिले थे तब कई जगह इस पर सवाल उठा और कहा गया कि पांचों अगड़ी जाति के मुस्लिम थे। दूसरी ओर भाजपा को पसमांदा की राजनीति करनी थी, जिसके बारे में कोई तीन महीने पहले हैदराबाद में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विस्तार से बात की थी।

सो, भाजपा ने सबसे पहले उत्तर प्रदेश से ही इसकी शुरुआत की है। यूपी के भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बासित अली ने कहा है कि उत्तर प्रदेश के तीन करोड़ पसमांदा मुस्लिमों को मुफ्त अनाज योजना का लाभ मिल रहा है। उन्होंने बताया कि 20 लाख पसमांदा मुस्लिमों को घर मिला है और 75 लाख को किसान सम्मान निधि मिली है। इससे पता नहीं मुस्लिम वोट भाजपा को मिलेगा या नहीं लेकिन उसकी खिलाफत नरम जरूर पड़ सकती है। अगर इतना भी हो गया तो भाजपा को बहुत फायदा हो जाएगा।

नीतीश ने यही प्रयोग मुख्यमंत्री के तौर पर अपना पहला कार्यकाल शुरू होने के साथ ही शुरू कर दिया था। उनको पता था कि वे लालू प्रसाद की तरह मास लीडर नहीं है। उनके पास माई समीकरण जैसा 30 फीसदी वोट का समीकरण नहीं है और उनको यह भी पता था कि किसी न किसी समय भाजपा से अलग होना होगा। इसलिए भाजपा के साथ रहते हुए उन्होंने पसमांदा यानी पिछड़े मुसलमानों की राजनीति शुरू की। उन्होंने पसमांदा सम्मेलन कराए और पसमांदा समाज से आने वाले स्वतंत्र पत्रकार अली अनवर को राज्यसभा में भेजा। भाजपा ने भी जम्मू कश्मीर के पसमांदा मुस्लिम गुलाम अली खटाना को राज्यसभा में भेजा है। सो, यह पूरी तरह से नीतीश के टेम्पलेट पर भाजपा की राजनीति है।

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