महाराष्ट्र में नीतीश, देवगौड़ा वाला खेल!

भारतीय जनता पार्टी को एक बार फिर जीवनदान मिल गया है। अजित पवार ने जीवनदान दिया है। इससे पहले नीतीश कुमार ने दिया था। ध्यान रहे जिस समय 2016 की नोटबंदी के फैसले के बाद लोगों की मुश्किलों के बीच भाजपा के कमजोर होने का अंदेशा था उस समय नीतीश कुमार ने आगे बढ़ कर भाजपा का समर्थन किया था। तब वे विपक्षी पार्टियों की उम्मीद थे। विपक्ष उनमें नरेंद्र मोदी का विकल्प देख रहा था। उन्होंने राजद और कांग्रेस के साथ मिल कर बिहार में भाजपा का विजय रथ रोका था। पर ऐन जिस समय भाजपा सबसे कमजोर थी और विपक्ष किसी निर्णायक वार का इंतजार कर रहा था उसी समय नीतीश ने नोटबंदी पर सरकार का समर्थन किया और आठ महीने बाद महागठबंधन तोड़ कर भाजपा के साथ चले गए।

ठीक उसी तरह महाराष्ट्र में अजित पवार के चाचा शरद पवार विपक्ष के मसीहा बने थे। उन्होंने विधानसभा चुनाव में भाजपा का विजय रथ एक तरह से रोक दिया था। ऐसा लग रहा था कि वे शिव सेना और कांग्रेस के साथ मिल कर गैर भाजपा सरकार बनवाने की रणनीति में चाणक्य की भूमिका निभा रहे हैं। लगभग कामयाबी तक पहुंच गए इस खेल की वजह से भाजपा के सारे सहयोगियों को नई ऊर्जा मिल गई थी। सारे सहयोगी भाजपा को तेवर दिखाने लगे थे। महाराष्ट्र के घटनाक्रम की प्रेरणा से ही झारखंड में आजसू ने भाजपा से तालमेल तोड़ा था और लोजपा के नेता चिराग पासवान की इतनी हिम्मत हो गई थी कि उन्होंने कहा था कि भाजपा को एनडीए की समन्वय समिति बनानी चाहिए। अब फिर सारे सहयोगी एक लाइन से भाजपा के पीछे खड़े होंगे।

जहां तक शरद पवार के इस बयान का सवाल है कि फैसला पार्टी का नहीं है, अजित पवार ने यह फैसला किया और इस पूरे खेल के पीछे उनका कोई हाथ नहीं है तो बता दें कि यह काम पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा पहले कर्नाटक में कर चुके हैं। उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी ने जब भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनने का फैसला किया था तब देवगौड़ा ने भी कहा था कि पार्टी टूट गई है और उनका पार्टी के नेताओं पर कोई वश नहीं है। पर हकीकत यह थी कि देवगौड़ा की

सहमति से ही उनके बेटे ने खेल किया था। सो, पवार का यह दांव भी नया नहीं है। एनसीपी में जो हो रहा है वह उनकी सहमति से हो रहा है और इसमें किसी को कोई संदेह नहीं रखना चाहिए।

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