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विस्तार की जरूरत का तर्क

भाजपा के और सहयोगी पार्टियों के जो सांसद मंत्री नहीं बन पाए हैं या जिनको उम्मीद है कि अगली फेरबदल में वे मंत्री बन सकते हैं वे बहुत तार्किक ढंग से समझा रहे हैं कि सरकार में विस्तार की क्यों जरूरत है। एक तो केंद्र सरकार में मंत्रियों की संख्या कम है और दूसरे कई मंत्रियों के पास दो-दो, तीन-तीन मंत्रालयों का प्रभार है। ध्यान रहे केंद्रीय मंत्रिपरिषद में प्रधानमंत्री सहित कुल 81 मंत्री हो सकते हैं पर अभी प्रधानमंत्री सहित कुल मंत्रियों की संख्या 63 है। इनमें प्रधानमंत्री सहित 24 कैबिनेट मंत्री हैं, नौ स्वतंत्र प्रभार के मंत्री हैं और 30 राज्यमंत्री हैं। सो, अभी 18 नए मंत्री बनाए जा सकते हैं। तभी पार्टी नेताओं को लग रहा है कि सरकार में जल्दी ही विस्तार होगा।

दूसरी बात यह भी है कि कई मंत्रियों के पास एक से ज्यादा मंत्रालयों के प्रभार हैं। जैसे रविशंकर प्रसाद के पास तीन मंत्रालय हैं। वे कानून मंत्री होने के साथ साथ संचार मंत्री भी हैं और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्रालय के भी प्रभारी हैं। इसी तरह नरेंद्र सिंह तोमर के पास भी तीन मंत्रालय हैं। वे कृषि व किसान कल्याण मंत्री हैं और उसके साथ साथ ग्रामीण विकास और पंचायती राज के भी मंत्री हैं। प्रकाश जावडेकर भी सूचना व प्रसारण मंत्रालय के साथ साथ वन व पर्यावरण और भारी उद्योग जैसे दो और बड़े मंत्रालय संभाल रहे हैं।

ऐसे ही स्मृति ईरानी के पास दो मंत्रालयों का प्रभार है। वे कपड़ा मंत्री हैं और साथ ही महिला व बाल विकास मंत्रालय भी संभाल रही हैं। डॉक्टर हर्षवर्धन भी तीन मंत्रालयों के मंत्री हैं। उनके पास स्वास्थ्य मंत्रालय का मुख्य रूप से जिम्मा है पर इसके अलावा वे विज्ञान व प्रौद्योगिकी और अर्थ साइंस के भी मंत्री हैं। पीयूष गोयल के पास रेलवे के साथ साथ वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय भी है। धर्मेंद्र प्रधान पेट्रोलियम के साथ साथ स्टील मंत्रालय भी संभाल रहे हैं। प्रहलाद जोशी के पास संसदीय कार्य के साथ साथ कोयला भी है और खान मंत्रालय भी है। माना जा रहा है कि विभागों के कामकाज की समीक्षा के बाद प्रधानमंत्री कुछ मंत्रियों का भार कम करेंगे और इसके लिए नए मंत्री नियुक्त करेंगे।

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