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सीएए का वैक्सीनेशन से क्या लेना देना?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि कोरोना वायरस को रोकने के लिए चल रहा वैक्सीनेशन अभियान खत्म होने के बाद संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए को लागू किया जाएगा। पश्चिम बंगाल के कूच बिहार की एक रैली में उन्होंने यह बात कही। इससे पहले संसद के चालू सत्र में उनके मंत्रालय के एक राज्यमंत्री ने सदन में कहा कि सरकार सीएए के नियम बना रही है और चार-पांच महीने में इसके नियम बन जाएंगे। उससे बहुत पहले पिछले साल के अंत में भाजपा के महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने कहा था कि जनवरी से बंगाल में सीएए लागू हो जाएगा। इन तीनों नेताओं के बयानों में न तो कोई तारतम्य है और न कोई समानता है।

ध्यान रहे संशोधित नागरिकता कानून सितंबर 2019 में संसद से पास किया गया था और उसके बाद राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के दस्तखत से यह कानून बन गया है। पर इसे अमल में लाने के लिए जो नियम अधिसूचित करने होते हैं वह नहीं हुआ है। सरकार डेढ़ साल बाद तक कानून के नियम नहीं बना पाई है, जबकि जून 2019 में अधिसूचना के जरिए लागू किए गए कृषि कानूनों के नियम लगभग तत्काल अधिसूचित कर दिए गए थे और कानून अमल में भी आ गया था। जाहिर यह प्राथमिकता का मामला है। सरकार को जिस कानून की प्राथमिकता समझ में आती है उसके नियम बनाए जाते हैं। सो, इसका मतलब है कि नागरिकता कानून की अभी प्राथमिकता नहीं है।

गृह मंत्री ने अब इसे अनिश्चितकाल तक टाल दिया है क्योंकि कोरोना वायरस को रोकने का वैक्सीनेशन अनिश्चितकाल तक चलने वाला है। वैक्सीनेशन अभियान शुरू होने के बाद सरकार का लक्ष्य 10 लाख लोगों को हर दिन टीका लगाने का था पर अभी करीब एक महीने में साढ़े तीन से पौने चार लाख लोगों को हर दिन वैक्सीन लगाई जा रही है। इस रफ्तार से अगर वैक्सीनेशन हुई तो भारत के हर नागरिक को वैक्सीन लगाने में 10-12 साल लगेंगे। क्या तब तक सीएए का मामला लंबित रहेगा?

यह समझ में नहीं आने वाली बात है कि सीएए का वैक्सीनेशन से क्या लेना-देना है? क्या वैक्सीनेशन की वजह से सरकार का कोई और काम रूका है? किसी और कानून के अमल पर रोक लगाई गई है? सीएए पर अमल तो बहुत छोटा काम है। यह कानून पड़ोसी देशों से धार्मिक प्रताड़ना का शिकार होकर भारत आए गैर मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता देने का है। ऐसे लोगों की संख्या बहुत बड़ी नहीं है। ऐसे ज्यादातर लोग पहचाने हुए हैं और शरणार्थी बस्तियों में रहते हैं। दिल्ली में भी ऐसे कुछ लोगों की बस्तियां हैं, जो बेहद अमानवीय स्थिति में रहते हैं। सरकार अगर सचमुच उन प्रताड़ित हिंदुओं के हित को लेकर चिंतित होती तो अब तक यह कानून लागू करके उनको नागरिकता दे दी गई होती। ऐसा लग रहा है कि सरकार को इसका चुनावी इस्तेमाल करना है और उसके लिए सही समय का इंतजार किया जा रहा है।

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