राजनीति

बंगाल चुनाव से पहले सीएए के नियम!

भारत सरकार ने अभी तक संशोधित नागरिकता कानून के नियम नहीं बनाए हैं। यह कानून पास हुए एक साल हो गए। कानून पास होने के बाद पूरे देश में ऐतिहासिक आंदोलन हुआ था। पूर्वोत्तर से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक कई जगह महीनों तक आंदोलन चलते रहे थे। दिल्ली की शाहीन बाग का आंदोलन तो रिकार्ड बनाने वाला था। लेकिन सरकार ने किसी आंदोलन पर ध्यान नहीं दिया। संसद के दोनों सदनों से संशोधित नागरिकता कानून, सीएए को पास कराया गया था और इसके थोड़े दिन के बाद सबकी अपीलों को दरकिनार करते हुए राष्ट्रपति महोदय ने उसे मंजूरी भी दे दी।

लेकिन हैरानी की बात है कि अभी तक सरकार ने इसे लागू करने के कानून नहीं बनाए हैं। आमतौर पर कानून पास होने के बाद छह महीने के अंदर उसके नियम बन जाते हैं। ऊपर से इस कानून के बारे में सरकार का दावा है कि यह किसी की भी नागरिकता छीनने वाला कानून नहीं है, बल्कि नागरिकता देने वाला कानून है। यह पड़ोसी देशों से धार्मिक प्रताड़ना झेल कर आने वाले सभी गैर मुस्लिम को भारत की नागरिकता देने का कानून है। फिर भी सरकार ने इसके नियमों को अधिसूचित नहीं किया है।

जानकार सूत्रों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव से ऐन पहले इसे अधिसूचित किया जाएगा। वैसे यह भी कहा जा रहा है कि पड़ोसी देश बांग्लादेश की संवेदनशीलता का चिंता में सरकार ने इसे अभी तक अधिसूचित नहीं किया है। ध्यान रहे बांग्लादेश की शेख हसीना सरकार इस कानून से नाराज थी और उसे लग रहा था कि सीएए और एनआरसी के जरिए बाहरी लोगों की पहचान करके भारत उन्हें वापस भेज सकता है। हालांकि भारत उन्हें भरोसा दिला चुका है कि किसी को भी बाहर नहीं निकाला जा रहा है।

बहरहाल, यह तय है कि अब बांग्लादेश की सरकार भले नाराज हो पर सरकार इससे नियमों को अधिसूचित करेगी और लागू करना शुरू करेगी। असल में भाजपा को इसका बड़ा फायदा पश्चिम बंगाल और असम में मिलने की उम्मीद है, जहां अगले साल अप्रैल-मई में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। इसके अलावा अगले साल केरल में भी चुनाव होने वाले हैं और वहां भी सांप्रदायिक विभाजन के मुद्दे के तौर पर सीएए और एनआरसी का इस्तेमाल हो सकता है। यह भी कहा जा रहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी नीतीश कुमार नहीं चाहते थे कि इस किस्म का कोई मुद्दा बनाया जाए। असल में उन्होंने हमेशा सांप्रदायिक विभाजन के मुद्दों को दूर रखा है। तभी प्रचार के दौरान भाजपा के इक्का-दुक्का नेताओं ने जरूर यह मुद्दा उठाया पर किसी बड़े नेता ने इस पर बयान नहीं दिया। नीतीश ने खुद अपनी चुनावी सभाओं में बार-बार कहा कि किसी में हिम्मत नहीं है कि भारत के किसी नागरिक को बाहर निकाल सके। बहरहाल, भाजपा के सामने असम और पश्चिम बंगाल में ऐसी कोई नैतिक या राजनीतिक बाधा नहीं होगी।

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देश | उत्तर प्रदेश | ताजा पोस्ट

Uttar Pradesh : धर्मांतरण कराने के लिए मिलते थे विदेश से पैसे, ATS ने रैकेट का खुलासा करते हुए 2 मौलानाओं को किया गिरफ्तार

नोएडा | उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण कराने वाले एक बड़े रैकेट का खुलासा हुआ है. एटीएस की टीम ने नोएडा से दो मौलानाओं को हिरासत में लिया है. इन दोनों मौलानाओं पर 1000 से ज्यादा लोगों के धर्मांतरण का आरोप लगाया गया है. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इन मौलानाओं को विदेश से भी फंडिंग मिलने के सबूत एटीएस को मिले हैं. बताया जा रहा है कि अभी सिर्फ दो लोगों की ही गिरफ्तारी हुई है लेकिन आने वाले समय में कई और लोगों की गिरफ्तारी की उम्मीद है. पुलिस सूत्रों का कहना है कि इस रैकेट में 100 से भी ज्यादा लोगों के शामिल होने की आशंका जताई जा रही है.

विदेशी फंडिंग के मिले सबूत

इस संबंध में जानकारी देते हुए उत्तर प्रदेश के एडीजी प्रशांत कुमार ने कहा कि इनका पहला टारगेट गरीब हिंदू परिवार होते हैं. उन्होंने बताया कि अब तक इन लोगों ने 18 से ज्यादा बच्चों का धर्मांतरण करा दिया है. एडीजी का कहना है कि किस काम के लिए इनके पास विदेश से भी फंडिंग आती थी. इसी पैसे का लालच देकर वे गरीब हिंदू परिवारों की महिलाओं और मुक बधिर बच्चों को फंसाने का काम करते थे. विदेशी फंडिंग पर किया गया सवाल पर उन्होंने कहा कि ऐसे कुछ सबूत जरूर मिले हैं जिससे स्पष्ट होता है कि उनके पास इस काम के लिए विदेश से पैसे आते थे. हालांकि उन्होंने यह बताने से अभी इनकार किया कि इस काम के लिए कौन सा देश इन्हें पैसे देता था.

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महलिओं और मूक बधिर बच्चों को करते थे टारगेट

एटीएस की टीम द्वारा गिरफ्तार किए गए दोनों मौलानाओं का नाम मोहम्मद उमर गौतम और मुफ्ती कारी जहांगीर है. यहां बता दें कि मोहम्मद उमर गौतम एक कन्वर्टेड मुसलमान है. पुलिस अब इन दोनों की मौलानाओं से सवाल पूछ रही है और यह जानने का प्रयास कर रही है कि इनके साथ और किन लोगों की सहभागिता रहा करती थी. पूछताछ में इन्होंने पुलिस को बताया है कि इनकी नजर गरीब परिवार के लोगों पर होती थी. धर्मांतरण के लिए यह दोनों विशेषकर महिलाओं और मूक बधिर बच्चों को टारगेट किया करते थे.

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