देश में 27 लाख करोड़ से ज्यादा की नकदी!

यह तो कई आंकड़ों से साबित हो गया है कि नोटबंदी का फैसला बुरी तरह से असफल रहा। उससे न तो काला धन खत्म हुआ और न जाली नोटों का प्रचलन बंद हुआ। नोटबंदी लागू करने के बाद उसकी विफलता भांप कर जिस दूसरे लक्ष्य का प्रचार हुआ था वह भी बुरी तरह से फेल हुआ है। बाद में कहा जाने लगा था कि नोटबंदी लेस कैश की अर्थव्यवस्था यानी कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था बनाने के लिए की गई थी। अब हकीकत यह है कि नवंबर 2016 के मुकाबले भारत में नकदी की मात्रा अब डेढ़ गुनी बढ़ गई है। उस समय जितनी नकदी बाजार में थी उससे करीब 50 फीसदी ज्यादा नकदी अब लोगों के हाथ में है।

रिजर्व बैंक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक इस समय लोगों के हाथ में 27 लाख 70 हजार करोड़ यानी करीब 28 लाख करोड़ रुपए की नकदी है। जिस समय नोटबंदी की गई थी उस समय 18 लाख करोड़ रुपए के करीब नकदी थी, जिसमें 15 लाख 44 हजार करोड़ रुपए के पांच सौ और एक हजार रुपए के नोट थे। इसमें से 15 लाख 28 हजार करोड़ रुपए रिजर्व बैंक में वापस लौट गए थे। बहरहाल, उस समय के 18 लाख करोड़ रुपए के मुकाबले अब करीब 28 लाख करोड़ रुपए की नकदी है। चार साल में 50 फीसदी नकदी बढ़ गई और वह इसलिए क्योंकि सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद देश की बैंकिंग व्यवस्था को लेकर लोगों में भरोसा नहीं बन रहा है। उलटे बैंकों पर से लोगों का भरोसा उठता जा रहा है। ऊपर से पांच सौ का नया नोट जारी हो गया था और एक हजार की जगह दो हजार के नोट आ गए थे। कोरोन वायरस की महामारी ने और भी लोगों के प्रेरित किया कि वे नकद पैसे हाथ में रखें। चालू वित्त वर्ष के पहले नौ महीने में नकदी की मात्रा 13 फीसदी बढ़ गई है।

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