केंद्र के प्रति राज्यों का अविश्वास

याद नहीं आता है कि नरेंद्र मोदी से ज्यादा किसी और नेता सहकारी संघवाद शब्द का इस्तेमाल किया हो। प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा इसका इस्तेमाल किया। वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी बात बात पर राज्यों को एकजुट करके केंद्र के प्रस्तावों को रूकवाते थे। लेकिन उनके शासन में राज्यों का केंद्र के प्रति जितना अविश्वास बढ़ा है वह भी ऐतिहासिक है। अविश्वास की ताजा मिसाल महाराष्ट्र सरकार की ओर से सीबीआई को राज्य के मामलों में जांच के लिए दी गई अनुमति वापस लेने का है। राज्य सरकार ने अपनी सहमति वापस से ली है। इसका मतलब है की सीबीआई को अगर किसी मामले की जांच करनी है तो उसे मामला दर मामला राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी। पश्चिम बंगाल, राजस्थान जैसे राज्य पहले ही इस मामले में अपनी सहमति वापस ले चुके हैं।

सोचें, शिव सेना के नेतृत्व वाली सरकार को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार पर भरोसा नहीं है। महाराष्ट्र सरकार ने यह जेनरल कंसेन्ट 1989 से दी हुई थी और पिछले 31 साल में इसे वापस लेने की जरूरत नहीं महसूस की गई। लेकिन अब राज्य सरकार ने वह सहमति वापस ली है क्योंकि उसे केंद्र सरकार और उसकी प्रीमियर एजेंसी पर भरोसा नहीं है। उसको लग रहा है कि एजेंसी किसी एजेंडे के तहत काम कर रही है।

यह भी हाल के समय पहली बार देखने को मिला है कि संसद से पास करके बनाए गए केंद्री कानूनों के विरोध में राज्य सरकारें कानून बना रही हैं। वे विधानसभा में प्रस्ताव पास करके केंद्रीय कानून में संशोधन कर रही हैं। संविधान में इसका प्रावधान है, जिसका वे इस्तेमाल कर रहे हैं। भले राष्ट्रपति उनके कानून को मंजूरी न दें लेकिन पंजाब, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों की विधानसभा में जो हो रहा है वह केंद्र की मंशा पर बड़ा सवाल है और साथ ही संसदीय प्रक्रिया को भी कठघरे में खड़ा करता है।

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