पारदर्शिता का महत्व समझे सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी और पसंदीदा सेंट्रल विस्टा परियोजना को सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिल गई है। सरकार और भाजपा दोनों के लोग खुश हैं और इस परियोजना पर सवाल उठाने वालों को मुंह चिढ़ा रहे हैं। पर सर्वोच्च अदालत का फैसला सरकार के लिए भी एक सबक है। अगर सरकार इस फैसले को ध्यान से पढ़े तो उसके लिए इसमें एक बड़ा मैसेज है। अदालत ने एक तरह से सरकार को पारदर्शिता का महत्व समझाया है और साथ ही यह भी बताया है कि विचार-विमर्श या किसी भी मामले में जन भागीदारी की बात सिर्फ औपचारिकता नहीं होती है।

हैरानी की बात है कि सरकार के शहरी विकास सचिव, जिनका मंत्रालय सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनने वाली नए संसद भवन को पीपुल्स पार्लियामेंट कह रहे हैं लेकिन इसमें कहीं भी लोगों की भागीदारी नहीं है। अदालत ने इस ओर ध्यान दिलाया है। ध्यान रहे अदालत का फैसला बहुमत का है और इसलिए इस फैसले को संपूर्णता से पढ़ा जाना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सिर्फ अपने मतलब की बात पढ़ कर बाकी चीजों की अनदेखी कर दी जाए। अदालत के फैसले से साफ है कि सरकार ने संस्थाओं से या तो सलाह-मशविरा नहीं किया या उनकी अनदेखी की।

सोचें, एक तरफ सरकार का यह फैसला कि 20 हजार करोड़ रुपए लगा कर नई संसद, नए सरकारी कार्यालय और प्रधानमंत्री आवास बनाया जाएगा तो दूसरी ओर आर्किटेक्चर व डिजाइन के विशेषज्ञों, नगर विकास के योजनाकारों, पर्यावरण के जानकारों, विरासत के संरक्षण का काम करने वाले कार्यकर्ताओं, अनेकों रिटायर अधिकारियों आदि की चिंता कि इससे विरासत को, पर्यावरण को, इस इलाके के सौंदर्य को नुकसान होगा! सरकार ने इन सारी चिंताओं की अनदेखी की। किसी पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी। यहां तक कि हेरिटेज कंजर्वेशन कमेटी तक से विचार-विमर्श नहीं किया गया।

तभी बहुमत के फैसले से अलग अपना फैसला लिखने वाले जस्टिस संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के ही एक पुराने फैसले की मिसाल देते हुए कहा कि सरकार के जिस फैसले से लोगों के जीवन पर असर होता हो, उसमें उनकी चिंताओं और सरोकारों को निश्चित रूप से शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने आगे यह भी कहा कि इस परियोजना के खिलाफ याचिका देने वालों की सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि परियोजना के बारे में लोगों को पर्याप्त सूचना नहीं मिली, कोई डिटेल नहीं मिली। फैसले में कहा गया है कि जब तक सारी जरूरी सूचनाएं सार्वजनिक नहीं की जाती हैं तब तक जनता अंधेरे में रहेगी और सरकार के साथ उसका सार्थक जुड़ाव नहीं बनेगी।

अगर सरकार इसे समझे तो यह बहुत बड़ा मैसेज है। यह सरकार ईमानदारी, पारदर्शिता की बात करके सत्ता में आई है पर दुर्भाग्य है कि पिछले साढ़े छह साल में सबसे ज्यादा असर पारदर्शिता पर ही हुआ है। सरकार सारी सूचनाएं छिपा रही है। सूचना के अधिकार कानून को एक तरह से अप्रासंगिक बना दिया गया है। यहां तक कि जनता के चंदे से बने पीएम-केयर्स फंड के बारे में भी कोई सूचना जनता को देने से इनकार कर दिया गया है।

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