दिल्ली में अध्यक्ष बदलने का मतलब

भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष बदल दिया है। पार्टी के सांसद और भोजपुरी फिल्मों के गायक-कलाकार मनोज तिवारी को हटा कर आदेश कुमार गुप्ता को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है। इस साल जनवरी में हुए विधानसभा चुनाव के बाद से ही दिल्ली में बदलाव की चर्चा थी पर इसके बावजूद मनोज तिवारी को हटाने की टाइमिंग हैरान करने वाली है। पांच महीने के बाद बिहार में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। ऐसे समय में बिहार के रहने वाले मनोज तिवारी को हटाने का क्या मतलब है? क्या भाजपा को लग रहा है कि मनोज तिवारी का बिहारी वोट में असर खत्म हो गया? क्या उन्हें दिल्ली से पलायन करने वाले बिहारी मजदूरों की मदद में मनोज तिवारी कहीं खड़े नहीं दिखाई दिए थे। और इसलिए पार्टी ने उनको हटाने का जोखिम लिया है या उनके लिए कोई और भूमिका सोची गई है?

दिल्ली के प्रवासी और खास कर बिहारी वोट के लिए तिवारी को लंबे समय तक अध्यक्ष बनाए रखने के बाद भाजपा अचानक उस वोट की राजनीति नहीं छोड़ सकती है। वह भी ऐसे समय में जब दो साल से कम समय में ही दिल्ली में नगर निगम का चुनाव होने वाला है। ध्यान रहे दिल्ली में तीनों नगर निगम पर भाजपा का कब्जा है। सो, भाजपा फिर से तीनों निगम पर कब्जा करना चाहेगी और इसके लिए उसे प्रवासी वोटों की भी जरूरत होगी। वैसे आदेश गुप्ता भी उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं पर वे प्रवासी वोटों में बहुत असर डाल पाएंगे, इसमें संदेह है। आखिर पार्टी ने पहले भी उत्तर प्रदेश के रहने वाले सतीश उपाध्याय को दिल्ली का प्रदेश अध्यक्ष बना कर रखा था पर उससे पार्टी को ज्यादा फायदा नहीं हुआ।

तभी यह कहा जा रहा है कि मनोज तिवारी को भाजपा कोई बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है। उनको केंद्र सरकार में मंत्री बनाया जा सकता है। ध्यान रहे दिल्ली से भाजपा के सिर्फ एक सांसद डॉक्टर हर्षवर्धन केंद्र में मंत्री हैं। आमतौर पर दिल्ली से दो केंद्रीय मंत्री होते हैं। पहले भी हर्षवर्धन के साथ साथ विजय गोयल को मंत्री बनाया गया था, भले वे राजस्थान से राज्यसभा सांसद थे। यह भी गौर करने की बात है हर्षवर्धन और गोयल दोनों वैश्य समाज से आते हैं। जब वैश्य समाज के दो लोग मंत्री थे तब मनोज तिवारी प्रदेश अध्यक्ष थे। अब वैश्य समाज के हर्षवर्धन मंत्री हैं और आदेश गुप्ता प्रदेश अध्यक्ष हैं। ऐसे में एक ब्राह्मण और प्रवासी नेता के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह बनती है। ऊपर से पांच-छह महीने में बिहार में चुनाव है और उसके बाद दिल्ली में नगर निगम के चुनाव होने हैं। तभी तिवारी समर्थक प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाए जाने से ज्यादा परेशान नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें अध्यक्ष के रूप में काम करते काफी समय हो गया था इसलिए उनको हटना ही था।

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