चीन के खिलाफ वोटिंग से बाहर क्यों रहा भारत?

चीन का भारत के प्रति रुख बहुत साफ है। वह अपना सामान भारत को बेचता है और तरफदारी पाकिस्तान की करता है। उसने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने के भारत सरकार के फैसले को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाया। उसने सुरक्षा परिषद में इस पर चर्चा कराई। 31 अक्टूबर को जब सरकार का फैसला अमल में आया तब भी चीन ने भारत विरोधी बयान दिया। इसके बावजूद हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के शिनजियांग प्रांत में मानवाधिकार के हनन का मामला उठा और वोटिंग की बारी आई तो भारत ने उसमें हिस्सा नहीं लिया।

पिछले तीन महीने में ऐसा दो बार हुआ है। यूरोपीय देशों ने यह मामला संयुक्त राष्ट्र में उठाया। चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत में लोगों पर होने वाली ज्यादती के मसले पर चर्चा हुई और करीब दो दर्जन देशों ने इस पर चीन के खिलाफ वोटिंग की। पर भारत दोनों बार वोटिंग से बाहर रहा।

क्या भारत के लिए यह अच्छा नहीं होता कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कश्मीर का मुद्दा उठाने के चीन के रवैए का बदला उसके खिलाफ वोटिंग करके लेता? पर उसने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। क्या यह वुहान स्पिरिट और चेन्नई कनेक्ट का नतीजा है? या भारत यह सोच कर चीन के खिलाफ वोटिंग से अलग रहा कि यह मामला चीन के मुस्लिम बहुल प्रांत का है तो उसे इसमें नहीं बोलना चाहिए? कारण चाहे जो हो पर इस सरकार के बाकी सारे कथित कूटनीतिक दांवों की तरह यह कूटनीति भी समझ में नहीं आने वाली है।

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