कांग्रेस में बीबीसी उर्फ भाई बहन कार्टेल

कांग्रेस पार्टी में नंबर एक परिवार के सदस्यों को शॉर्ट नेम से संबोधित करने का चलन रहा है, खासतौर से उनके पीछे होने वाली बातचीत में। जैसे इंदिरा और सोनिया गांधी दोनों के लिए मिसेज गांधी का संबोधन था और बाद में सोनिया को बहुत से लोग मिसेज जी कहने लगे थे। प्रियंका गांधी वाड्रा तो उनके पति रॉबर्ट वाड्रा पी कह कर बुलाते हैं तो वे कांग्रेस में नेताओं के लिए मिसेज पी हो गईं। राहुल गांधी को सारे लोग आरजी नाम से बुलाते हैं। हिंदी में कुछ लोग रागा बोलते हैं पर ज्यादातर लोग आरजी ही बुलाते हैं। यहां तक कि औपचारिक बातचीत में भी आरजी संबोधन का इस्तेमाल होता है। उनका ऑफिस आरजी ऑफिस कहलाता है।
पर इन तमाम संबोधनों के बीच एक नई टर्मिनोलॉजी कांग्रेस में चर्चा में है, जो राहुल और प्रियंका दोनों के लिए एक साथ इस्तेमाल किया जा रहा है। राहुल और प्रियंका दोनों की टीम के लिए कांग्रेस के पुराने नेताओं ने बीबीसी का संबोधन दिया। इसका मतलब है भाई बहन कार्टेल। राहुल और प्रियंका के करीबी नेताओं को बीबीसी का हिस्सा बताया जा रहा है।

असल में कांग्रेस कार्य समिति की पिछली बैठक में राहुल और प्रियंका दोनों ने पार्टी के पुराने नेताओं को जम कर निशाना बनाया। राहुल इस बात को लेकर नाराज थे कि पार्टी के पुराने नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नाम लेकर निशाना क्यों नहीं बनाते हैं। कार्य समिति की बैठक शुरू हुई तो आरपीएन सिंह ने कहा कि नरेंद्र मोदी का नाम लेकर हमला करने से या उनके ऊपर बहुत ज्यादा फोकस बनाने से पार्टी को नुकसान हो रहा है। इस पर राहुल गांधी भड़के और फिर प्रियंका भी नाराज हुईं। किसी जमाने में आरपीएन को राहुल का करीबी माना जाता था। पर पिछले कुछ समय से उनकी ज्यादा करीबी पार्टी के पुराने नेताओं से खास कर अहमद पटेल से हो गई है। इससे राहुल और प्रियंका दोनों नाराज बताए जा रहे हैं। बहरहाल, उनके बोलने के बाद इस बात पर बहस हो गई कि पार्टी के पुराने नेता मोदी का नाम क्यों नहीं लेना चाहते। इसके बाद राहुल और प्रियंका के करीबियों में से सुष्मिता देब, रणदीप सुरजेवाला, बी श्रीनिवास आदि ने मोर्चा संभाला। उसी बैठक के बाद बीबीसी के जुमले की ईजाद हुई और राहुल, प्रियंका के करीबी नेताओं को बीबीसी यानी भाई बहन कार्टेल का हिस्सा बताया जाने लगा। यह जुमला इतना चलने लगा कि कांग्रेस के करीबी रहे पत्रकार और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार रहे हरीश खरे ने अपने लेख में भी इसका जिक्र किया।

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