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राज्यों में नेता नहीं चुन पा रही कांग्रेस

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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आए तीन हफ्ते हो गए हैं। सभी राज्यों में नई सरकारें बन गई हैं लेकिन मणिपुर छोड़ कर बाकी तीन राज्यों में जहां कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल के तौर पर उभरी हैं वहां अभी तक नेता नहीं चुना गया है। इन तीनों राज्यों के प्रदेश अध्यक्षों के भी इस्तीफे हो गए हैं लेकिन नए अध्यक्ष की नियुक्ति कब होगी, यह भी किसी को पता नहीं है। बहरहाल, संगठन में जब फेरबदल होगी तब होगी लेकिन पार्टी के विधायक दल का नेता तो चुन देना चाहिए था। आखिर सभी विधानसभाओं का पहला सत्र भी हो गया। फिर भी कांग्रेस नेता नहीं चुन पाई है। Congress leaders in states

उत्तराखंड और पंजाब में कांग्रेस की समस्या समझ में आती है कि उसने जिन नेताओं के चेहरे पर चुनाव लड़ा था वे ही हार गए। लेकिन गोवा में क्या समस्या है यह समझ में नहीं आ रहा है। गोवा में कांग्रेस किसी के चेहरे पर नहीं लड़ी थी लेकिन यह तय माना जा रहा था कि अगर कांग्रेस जीती तो पिछली विधानसभा में नेता विपक्ष रहे दिगंबर कामत उसके सीएम बनेंगे। कामत विधानसभा का चुनाव जीत गए हैं लेकिन अभी तक कांग्रेस ने उनको नेता बनाने का फैसला नहीं किया है। किसी और का नाम कांग्रेस को तय करना है तो वह भी अब तक हो जाना चाहिए था।

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पंजाब में कांग्रेस चरणजीत सिंह चन्नी के चेहरे पर लड़ी थी। चुनाव से ठीक पहले उनको मुख्यमंत्री बना कर पार्टी ने दलित कार्ड खेला था। वे दो सीटों से विधानसभा का चुनाव लड़े थे और दोनों जगह हार गए। अब कांग्रेस के सामने मुश्किल है कि किसको नेता बनाया जाए। उसके प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू भी चुनाव हारे हुए हैं। पूर्व उप मुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, पूर्व सांसद प्रताप सिंह बाजवा और राजा अमरिंदर वडिंग चुनाव जीते हैं और तीनों अपने लिए लॉबिंग कर रहे हैं।

उत्तराखंड में कांग्रेस की ओर से अघोषित दावेदर हरीश रावत थे लेकिन वे भी विधानसभा का चुनाव हार गए हैं। सो, पार्टी को समझ नहीं आ रहा है कि किसको विधायक दल का नेता बनाया जाए। पुराने और बड़े नेता या तो भाजपा में चले गए या उनका निधन हो गया। जो नेता भाजपा से वापस कांग्रेस में लौटे वे या तो चुनाव नहीं लड़े या पार्टी उनको विधायक दल का नेता नहीं बनाना चाह रही है। सोचें, कांग्रेस में फैसले कितने मुश्किल हैं। पार्टी को नेता विपक्ष चुनना है और वह नहीं हो पा रहा है। कांग्रेस के जानकार नेताओं का कहना है कि पार्टी आलाकमान को आम सहमति बनाने की चिंता है। यह आलाकमान की ताकत कम होने का संकेत है।

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