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Saturday, April 17, 2021
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कांग्रेस को नए नेताओं की जरूरत

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कांग्रेस पार्टी को नए नेताओं की जरूरत है। पिछले हफ्ते हुए कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में हालांकि इस पर विचार नहीं हुआ क्योंकि फिर से नए बनाम पुराने नेताओं का झगड़ा शुरू हो जाता। पर बैठक के बाद कांग्रेस के एक नेता ने पत्रकारों से अनौपचारिक बातचीत में कहा है कि कांग्रेस पार्टी को आज भी वे ही नेता चला रहे हैं, जो 20 साल पहले चलाते थे। दूसरी ओर भाजपा का पूरा नेतृत्व बदल गया। यहां तक कि ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियों में भी नेतृत्व बदल गया। कम्युनिस्ट पार्टियों का भी नेतृत्व बदल गया। लेकिन कांग्रेस में जब भी नए नेता को आगे करने की बात होती है तो पुराने नेता अड़ंगा डालने लगते हैं।

कांग्रेस नेता ने याद दिलाया कि कैसे राजीव गांधी के साथ पार्टी का नया नेतृत्व उभरा था। राजीव गांधी ने 35-36 साल की उम्र के अहमद पटेल और दिग्विजय सिंह को गुजरात व मध्य प्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी थी। नए और पुराने नेताओं के झगड़े में गए बगैर कांग्रेस नेताओं को अफसोस है कि राजीव गांधी के समय जो नेतृत्व बना वही आज तक कांग्रेस पार्टी का संचालन कर रहा है। सबसे युवा महासचिव मुकुल वासनिक बने थे और आज भी महासचिव बने हुए हैं।

कांग्रेस में युवा नेतृत्व नहीं उभरने का कारण यह है कि पार्टी के अंदर युवा या नए नेताओं को लेकर हिचक है तो दूसरी ओर पुराने नेता इतने प्रभावी हैं कि वे हमेशा उनका रास्ता रोक देते हैं। सोनिया गांधी के पास अपने असर की वजह से अहमद पटेल दशकों तक पार्टी का संचालन करते रहे। उनके निधन के बाद भी उनकी जगह लेने के लिए कोई नया नेता नहीं आया, बल्कि बुजुर्ग पवन बंसल आ गए। अहमद पटेल से पहले भी कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी मोतीलाल वोरा संभालते थे। पता नहीं क्या सोच है कि कोषाध्यक्ष कोई पुराना नेता ही होगा, जबकि भाजपा में 56 साल के पीयूष गोयल पिछले एक दशक से ज्यादा समय से कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

आज से 20 साल पहले भी कांग्रेस में एके एंटनी, दिग्विजय सिंह, कैप्टेन अमरिंदर सिंह, अशोक गहलोत, अंबिका सोनी, मुकुल वासनिक, पी चिदंबरम, मल्लिकार्जुन खड़गे, गुलाम नबी आजाद जैसे नेता ही महत्वपूर्ण थे और पार्टी का कामकाज संभालते थे और आज भी ये ही नेता पार्टी संभाले हुए हैं। महिला कांग्रेस या यूथ कांग्रेस में नए नेता जरूर आए हैं या मीडिया की जिम्मेदारी नए नेताओं को मिली है लेकिन पार्टी की गतिविधियों में न तो उनका ज्यादा योगदान है और न ज्यादा महत्व है। राज्यों में भी नए नेताओं को उन्हीं जगहों पर महत्व मिला, जहां या तो पुराने नेता का निधन हो गया या नेता पाला बदल कर दूसरी पार्टी में चला गया या अपनी पार्टी बना ली। राहुल और प्रियंका के सक्रिय राजनीति में आ जाने के बावजूद पार्टी में नया नेतृत्व नहीं उभर रहा है।

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