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Monday, April 19, 2021
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अहमद पटेल के नहीं होने का असर!

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कांग्रेस पार्टी की आंतरिक राजनीति में अभी जो कुछ चल रहा है, कई लोग इसे अहमद पटेल के नहीं होने का असर मान रहे हैं। हालांकि जी-23 के नाम से मशहूर कांग्रेस के नाराज नेताओं ने अहमद पटेल के रहते ही पिछले साल अगस्त में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखी थी और ऐसा नहीं था कि पटेल ने सब को मना लिया था। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा उनके बहुत करीबी थी और उन्हीं की कृपा से 10 साल मुख्यमंत्री बने रहे थे। फिर भी वे बागी नेताओं में शामिल हो गए थे।

इसलिए कांग्रेस में राहुल गांधी के करीबी नेता मान रहे हैं कि अहमद पटेल के होने या नहीं होने का कोई खास असर नहीं हुआ है। लेकिन वे भी यह स्वीकार कर रहे हैं कि गुजरात में स्थानीय निकाय चुनावों में जो हुआ है वह अहमद पटेल के नहीं होने का असर है। ध्यान रहे गुजरात के शहरी निकाय चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन बहुत खराब हुआ है। शहरी निकायों के 576 वार्डों में पार्षद का चुनाव हुआ था, जिसमें कांग्रेस पार्टी सिर्फ 44 सीट जीत पाई। सूरत नगर निगम में तो कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला।

सूरत में कांग्रेस शून्य पर रही और आम आदमी पार्टी को 27 सीटें मिल गईं। 120 सदस्यों के इस निकाय में पिछली बार भाजपा 80 और कांग्रेस 36 सीटों पर जीती थी। पर हैरानी की बात है कि पाटीदार अनामत आंदोलन समिति यानी पास के सबसे मजबूत असर वाले इस इलाक में कांग्रेस खाता भी नहीं खोल पाई, जबकि पास के सबसे बड़े नेता हार्दिक पटेल इस समय कांग्रेस के साथ हैं। इसके बावजूद पास ने आम आदमी पार्टी का समर्थन कर दिया। गुजरात में पंचायतों के भी चुनाव हुए हैं और कांग्रेस नेता उनमें भी अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद नहीं कर रहे हैं।

असल में प्रदेश कांग्रेस में इस समय कई गुट बन गए हैं। राहुल गांधी ने अमित चावड़ा और परेश धनानी को प्रदेश अध्यक्ष और विधायक दल का नेता बना कर पार्टी की कमान सौंपी है तो दूसरी ओर भरत सिंह सोलंकी, अर्जुन मोडवाडिया, शक्ति सिंह गोहिल, तुषार चौधरी जैसे नेता भी हैं। इस बीच कांग्रेस ने थोड़े समय पहले तक पास की राजनीति करने वाले हार्दिक पटेल को पार्टी में शामिल कराया है और दलित नेता जिग्नेश मेवानी भी कांग्रेस में शामिल हो गए थे। सो, नेताओं के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। अहमद पटेल यह काम करते थे। गृह प्रदेश होने की वजह से वे हर गुट के नेताओं को संतुष्ट रखते हुए पार्टी को जमीन पर मजबूत रखे हुए थे। कांग्रेस के नेता मान रहे हैं कि उनके नहीं होने से गुजरात कांग्रेस में खुला खेल फर्रूखाबादी हो गया है। सब अपनी राजनीति कर रहे हैं। नेताओं के ऊपर किसी की कमान नहीं है। यहां तक कि पास के साथ तालमेल बैठाने का काम भी कांग्रेस नहीं कर पाई। राहुल के करीबी राज्यसभा सांसद राजीव सातव प्रभारी हैं, लेकिन वे बहुत असरदार नहीं हैं।

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