अब सहकारी बैंक भी आरबीआई की निगरानी में

भारत की मौजूदा सरकार और मौजूदा प्रधानमंत्री ने सहकारी संघवाद का सबसे ज्यादा जिक्र किया है। पर सरकार के हर फैसले से संघवाद की कोई न कोई पुरानी व्यवस्था गिर जा रही है। जैसे कृषि से संबंधित जो कानून सरकार बना रही है उससे राज्यों के अधिकार बहुत सीमित हो रहे हैं। ऐसे ही सरकार ने संसद से बैंकिंग रेगुलेशन संशोधन विधेयक 2020 पास कराया है। इससे भी राज्यों के अधिकार पर चोट हुई है।

ध्यान रहे भारत में सहकारी बैंकों के नियमन का काम राज्यों के हाथ में होता है। लेकिन केंद्र सरकार ने पंजाब एंड महाराष्ट्र, पीएमसी बैंक की गड़बड़ियों के बहाने सहकारी बैंकों का प्रबंधन राज्यों के हाथ से ले लेने का फैसला किया। ध्यान रहे कुछ दिन पहले पीएमसी बैंक का संकट आया था, जिसके बाद बैंक के ग्राहकों को पैसा निकालने से रोक दिया गया था। बाद में निकासी सीमित की गई। इसे आधार बना कर सरकार ने राज्यों का अधिकार आरबीआई को दे दिया है। देश में कुल 1482 शहरी सहकारी बैंक हैं और 58 बहुराज्यीय सहकारी बैंक हैं। अब इनका नियामक आरबीआई है।

सोचें, एक पीएमसी बैंक की गड़बड़ी के आधार पर राज्यों से अधिकार लेकर आरबीआई को दिया गया तो यस बैंक की जो गड़बड़ी हुई है या आईडीबीआई दिवालिया हुआ या आईसीआईसीआई बैंक की चेयरपर्सन ने कथित तौर पर घोटाला किया या पंजाब नेशनल बैंक का नीरव मोदी-मेहुल चौकसी घोटाला हुआ क्या उसके आधार पर आरबीआई को भी नियामक से नहीं हटा देना चाहिए? भारत में बैंकों की सारी गड़बड़ी आरबीआई के नियामक रहते ही हुई। लाखों करोड़ रुपए हर साल बट्टे खाते में डाले जा रहे हैं। बैंकों को चलाए रखने के लिए हर साल करदाताओं का हजारों करोड़ रुपया उनमें डाला जा रहा है। हर साल बैंकिंग फ्रॉड की हजारों घटनाएं हो रही हैं और बैंकों को लाखों करोड़ रुपए का चूना लगा कर लोग फरार हो जा रहे हैं। य़ह सब आरबीआई की नाक के नीचे हो रहा है। सबसे अक्षम एजेंसी साबित हुई है आरबीआई इसके बावजूद अब डेढ़ हजार और बैंकों का जिम्मा उसको दिया जा रहा है।

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