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दिल्ली और मुंबई का फर्क

कोरोना वायरस का एपीसेंटर रहे मुंबई में अब रोज ढाई हजार के करीब केसेज आ रहे हैं और टेस्टिंग कम करने के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में औसतन 20 हजार केस रोज आ रहे हैं। दिल्ली में ऑक्सीजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली हाई कोर्ट ने लगातार 10 दिन तक केंद्र सरकार को फटकार लगाई और सुप्रीम कोर्ट ने भी दो टूक निर्देश देते हुए केंद्र से कहा कि वह हर दिन सात सौ मीट्रिक टन ऑक्सीजन दिल्ली को उपलब्ध कराए, वरना अदालत सख्त रुख अख्तियार करेगी। इसके उलट मुंबई या पूरे महाराष्ट्र में कहीं भी ऑक्सीजन की कमी की खबर नहीं आई। तभी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने मुंबई मॉडल अपनाने की नसीहत दी। दिल्ली में अस्पताल के बेड्स, ऑक्सीजन सिलेंडर, टेस्टिंग और वैक्सीनेशन चारों के लिए हाहाकार है, जबकि मुंबई में एकाध अपवाद को छोड़ दें सब कुछ बिल्कुल सहज अंदाज में चल रहा है।

सवाल है कि दिल्ली और मुंबई में ऐसा रात और दिन का फर्क क्यों है? कायदे से तो दिल्ली में स्थिति बेहतर होनी चाहिए थी क्योंकि वह राष्ट्रीय राजधानी है और एक साथ कई सरकारें काम कर रही हैं? इसका एक हिस्सा सीधे देश के प्रधानमंत्री के अधीन आता है तो दूसरा हिस्सा मुख्यमंत्री के अधीन आता है, तीसरा हिस्सा सेना के अधीन आता है तो चौथा हिस्सा तीन नगर निगमों के जिम्मे है, इसके बावजूद यह संकट क्यों है? इस संकट का एक बड़ा कारण तो यह है कि इतनी तरह की प्रशासकीय व्यवस्था हैं। दूसरा कारण यह है कि इनमें से कोई भी प्रशासकीय व्यवस्था काम नहीं कर रही है। सब सिर्फ राजनीति कर रहे हैं और एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।

असल में दिल्ली और मुंबई का फर्क एक नेता और अधिकारी का है। मुंबई में राज्य का एक मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे हैं और उनके चुने हुए अधिकारी- बृहन्नमुंबई महानगरपालिका के कमिश्नर इकबाल सिंह चहल हैं। इन दो लोगों की वजह से रात और दिन का फर्क बना है। बताते हैं कि इकबाल सिंह चहल को बीएमसी कमिश्नर बनाते समय मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कहा था- अगर आप अच्छा काम करते हैं तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अगर काम बिगड़ता है तो मैं उसकी जिम्मेदारी लूंगा। मुख्यमंत्री के इस वाक्य ने जादू जैसा काम किया और चहल ने वह तैयारी की, जिसकी मिसाल पूरे देश में नहीं है।

सोचें, जिस महानगर में एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती है और जो महानगर सर्वाधिक जनसंख्या घनत्व वाला हो वहां कोरोना पर काबू पाना और दूसरी लहर को भी रोके रहना, कितना बड़ा काम है। चहल ने पहली लहर के समय ही ऑक्सीजन उत्पादन बढ़ाने और उसे  स्टोर करने की तैयारी शुरू कर दी थी। जान कर हैरानी होगी कि वहां एक नहीं, बल्कि छह वार रूम काम कर रहे हैं। हर अस्पताल के साथ तालमेल के लिए अधिकारी नियुक्ति हैं। इसके उलट दिल्ली नगर निगम की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए इसे तीन हिस्सों में बांटा गया है लेकिन कोई निगम काम नहीं कर रहा है। आज बीएमसी कमिश्नर चहल को पूरा देश जानता है लेकिन क्या कोई बता सकता है दिल्ली के तीन नगर निगमों के कमिश्नर कौन हैं या मेयर कौन कौन हैं?

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