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Thursday, May 6, 2021
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राहुल मिसाल बनाने में नाकाम रहे

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कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी देश के इकलौते बड़े नेता हैं, जिन्होंने कोरोना महामारी के खतरे को पूरी गंभीरता से समझा था। उन्होंने पिछले साल जनवरी से ही प्रधानमंत्री और सरकार को आगाह करना शुरू कर दिया था। इसलिए उनसे उम्मीद की जा रही थी कि वे बाकी नेताओं से हट कर अलग मिसाल कायम करेंगे। लेकिन उन्होंने यह मौका गंवा दिया। वे पश्चिम बंगाल में पहले चार चरण के चुनाव में प्रचार के लिए नहीं गए थे। इसलिए जब कोरोना वायरस के केसेज बढ़ने लगे तो वे प्रचार में जाने से मना कर सकते थे। वे अपनी पार्टी वर्चुअल चुनावी रैली के लिए कह सकते थे। उनका यह कदम कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सहित बाकी केंद्रीय मंत्रियों, राज्य की मुख्यमंत्री और सत्तारूढ़ दल के नेताओं को शर्मिंदा करने वाली बात होती।

पर राहुल ने यह मौका गंवा दिया। उन्होंने आखिरी चुनावी रैली चार अप्रैल को की थी, जिस दिन तीन राज्यों- केरल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी की सभी सीटों पर और एक राज्य असम में आखिरी चरण की सीटों पर प्रचार खत्म हुआ। उसके बाद से राहुल 10 दिन तक घर बैठे रहे और 14 अप्रैल को प्रचार के लिए पश्चिम बंगाल गए। वे नहीं भी जाते तो उनका काम चल जाता। वैसे भी कांग्रेस पार्टी बंगाल में कोई बहुत कमाल करने के लिए चुनाव नहीं लड़ रही है। राहुल के प्रचार करने से भी कांग्रेस की हालत में कोई सुधार होने की संभावना नहीं है। इसलिए अगर वे अपनी रैली नहीं करके या वर्चुअल रैली के लिए पार्टी पर दबाव बना कर वे एक मैसेज दे सकते थे। आम लोगों के बीच कोरोना के प्रति और लोगों के स्वास्थ्य के प्रति सजग एक नेता होने की उनकी छवि इससे मजबूत होती। लेकिन अब वे भी मोदी, शाह आदि नेताओं की श्रेणी में ही हैं, जो दिल्ली में बैठ कर लोगों को कोरोना के बारे में सावधान करते हैं और बंगाल जाकर बड़ी रैलियां कर रहे हैं। उनसे बेहतर लेफ्ट पार्टियों ने किया, जिन्होंने रैलियां बंद कर दी है और डोर टू डोर कैंपेन का तरीका अपनाया है।

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