भारत और दुनिया का फर्क?

भारत और दुनिया की राजनीति का फर्क कई बातों में जाहिर होता है। उनमें से एक बात यह भी है कि भारत में पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे के प्रति जानी दुश्मन का भाव रखते हैं। एक दूसरे के नीतिगत विरोध और वैचारिक विरोध की बजाय हर चीज का विरोध किया जाता है और वह अभूतपूर्व संकट के समय भी जारी रहता है। जैसे अभी कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के बीच भी जारी है। इसके उलट दुनिया भर के देशों में एक अलग ही मिसाल बनाई जा रही है पर भारत के नेता इससे सबक नहीं लेते हैं।

सबसे बड़ी मिसाल नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने कायम की है। यूरोप में जैसे ही कोरोना वायरस के संक्रमण के मामले बढ़ने लगे वैसे ही नीदरलैंड ने बचाव का उपाय शुरू किया और मार्च के महीने में ही प्रधानमंत्री मार्क रूटे ने मुख्य विपक्षी लेबर पार्टी के नेता मार्टिन वैन रिन को देश का मेडिकल केयर मंत्री नियुक्त किया। सोचें, मुख्य विपक्षी पार्टी के नेता को प्रधानमंत्री ने देश का स्वास्थ्य मंत्रालय संभालने की जिम्मेदारी दी। सिर्फ इसलिए कि वे पहले सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे थे और अच्छा काम किया था। क्या भारत के बारे में कभी ऐसा सोचा जा सकता है? एक बड़ी मिसाल तो भारत के बगल में बनी है। हालांकि वह कोरोना वायरस की वजह से नहीं बनी है पर अफगानिस्तान में दो विरोधी नेताओं के बीच सत्ता की साझेदारी का फार्मूला बना है। इस फार्मूले के तहत अशरफ गनी राष्ट्रपति बने रहेंगे और उनके विरोधी अब्दुल्ला अब्दुल्ला को आधे मंत्रालय दिए गए हैं। भारत में तो खैर इस समय पूर्ण बहुमत की सरकार है पर जब 30 साल तक अस्थिरता थी तब भी ऐसा नहीं सोचा जा सकता था।

इसी किस्म की मिसाल इजराइल ने बनाई है। इजराइल में पिछले करीब एक साल से राजनीतिक अस्थिरता का माहौल है और इस दौरान तीन बार चुनाव हुए हैं। इसके बावजूद जब मसला नहीं सुलझा तब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अपने विरोधी नेता बेनी गैंट्ज के साथ मिल कर सरकार बनाई। गैंट्ज को वैकल्पिक प्रधानमंत्री का दर्जा दिया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares