राज्यों को अधिकार देने की अलग समस्या

कोरोना वायरस के संक्रमण से लड़ने की भारत की समूची रणनीति अव्यवस्था में बदल गई है। पहले दिन से सुविचारित योजना नहीं होने की वजह से ऐसा हुआ है। जब कोरोना वायरस से लड़ाई शुरू हुई तो कमान केंद्र ने अपने हाथ में रखी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 मार्च को राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात की थी पर लॉकडाउन के बारे में उस बैठक में कोई चर्चा नहीं हुई और 24 मार्च को रात आठ बजे प्रधानमंत्री ने अचानक लॉकडाउन का ऐलान कर दिया। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने दो दिन पहले ही इस पर सवाल उठाया है। लॉकडाउन के पहले चरण के 21 दिन और उसके बाद के 19 दिन कमान केंद्र सरकार ने मोटे तौर पर अपने हाथ में रखी। इसके बाद जब लगा कि 40 दिन में कोई बदलाव नहीं आ रहा है और लॉकडाउन से निकलना मुश्किल होगा तो केंद्र ने कमान छोड़ दी। तीसरे लॉकडाउन की घोषणा प्रधानमंत्री ने नहीं की और उसके बाद राज्यों को जिम्मा दे दिया गया। हालांकि तब भी केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से दिशा-निर्देश जारी किए जा रहे थे। अब ऐसा लग रहा है कि सब कुछ राज्यों के हाथ में छोड़ दिया है। जो काम केंद्र सरकार का है उसमें भी राज्यों का दखल है। जैसे विमान उड़ाने के मामले में भी राज्यों ने आपत्ति की है और अलग अलग नियम बनाए हैं।

जिस समय केंद्र के हाथ में सब कुछ केंद्रित था तब अलग समस्या थी। कहा जा रहा था कि इतने बड़े देश में केंद्र कैसे हर राज्य के लिए नियम बना सकता है और एक नियम सब राज्य में कैसे फिट होगा। अब कहा जा रहा है कि राज्य अलग अलग नियम बना रहे हैं, जिसकी वजह से परेशानी हो रही है। पहले केंद्र सरकार रेड, ऑरेंज और ग्रीन जोन बनाती थी। बाद में राज्यों को इसका जिम्मा दिया गया तो राज्यों ने मनमानी शुरू कर दी। जैसे दिल्ली में संक्रमितों की संख्या बढ़ती गई और रेड जोन की संख्या घटा दी गई। उधर महाराष्ट्र में सरकार ने पूरे राज्य को रेड और नॉन रेड जोन में बदल दिया। ऐसे ही रेल, बस और विमान सेवाओं के बारे में सभी राज्यों ने अलग अलग नियम बना दिए। गोवा में कोई यात्री चाहे किसी साधन से जाए उसे कोरोना निगेटिव प्रमाणपत्र लेकर जाना होगा। कहां सिर्फ थर्मल स्क्रीनिंग से काम चल रहा है तो कहीं एंटीबॉडी टेस्ट की बात हो रही है। कहीं सात दिन का क्वरैंटाइन है तो कहीं 14 दिन का। कहीं होम क्वरैंटाइन है तो कहीं इंस्टीट्यूशनल है। कर्नाटक में छह राज्यों के लिए अलग नियम है और बाकी राज्यों के लिए अलग। मजदूरों की आवाजाही को लेकर भी सभी राज्यों के अपने अपने नियम हो गए। यूपी सरकार ने अब कहा है कि उसके यहां से मजदूर ले जाने से पहले दूसरे राज्यों को मंजूरी लेनी होगी। समझा जा सकता है कि ऐसी अव्यवस्था की स्थिति में लोगों को कितनी परेशानी होती होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares