सब ‘कोवैक्सीन’ के पीछे पड़े हैं

भारत सरकार ने कोरोना वायरस की दो वैक्सीन को मंजूरी दी है, जिसमें एक ब्रिटिश-स्वीडिश कंपनी की वैक्सीन है, जिसे निजी क्षेत्र की कंपनी सीरम इंस्टीच्यूट ऑफ इंडिया ने बनाया है। दूसरी वैक्सीन भारत सरकार की कंपनी भारत बायोटेक ने बनाई है। इस पर रिसर्च भी भारत बायोटेक का है और उत्पादन भी वहीं कर रही है। भारत की स्वदेशी वैक्सीन वही है, जिससे आत्मनिर्भर भारत की तस्वीर बनती है। इसकी वैक्सीन की नाम कोवैक्सीन है और ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन की नाम कोवीशील्ड है। कोवैक्सीन का तीसरे चरण का परीक्षण अभी चल ही रहा है कि उससे पहले भारत सरकार ने उसे मंजूरी दे दी। इसके अलावा उस वैक्सीन में कोई कमी नहीं है। फिर भी सब उस वैक्सीन के पीछे पड़े हैं। तभी सवाल है कि क्या कारपोरेट प्रतिद्वंद्विता की वजह से हो रहा है?

सोचें, सीरम इंस्टीच्यूट में बनी वैक्सीन का सिर्फ तीसरे चरण का परीक्षण भारत में हुआ था, जिसमें सिर्फ 16 सौ लोग शामिल थे। भारत बायोटेक के तीनों चरण का परीक्षण भारत में हुआ है और तीसरे चरण में 26 हजार वालंटियर शामिल हैं। इसका साइड इफेक्ट भी कम है और यह सीरम की वैक्सीन से ज्यादा प्रभावी भी है। फिर भी सवाल इसी पर उठ रहे हैं। इसके एक वालंटियर की मौत हो गई, जो कि सीधे वैक्सीन से नहीं जुड़ी है फिर भी मीडिया में इसके खिलाफ माहौल बना और एनजीओ खड़े हो गए इसका परीक्षण रूकवाने। उधर कोवीशील्ड से जुड़े एक वालंटियर को मानसिक रोग हो गई और ऐसा लग रहा है कि यह सीधे वैक्सीन से जुड़ा मामला है तब भी उसे लेकर कोई चर्चा नहीं है। उलटे आरोप लगाने वाले वालंटियर पर करोडों रुपए का दावा करके चुप करा दिया गया। सरकार सचमुच आत्मनिर्भर भारत जैसी बातों को लेकर गंभीर है तो उसे इसकी सचाई का पता लगाना चाहिए।

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