फिर शुरू हो गई राजनीति

मार्च के आखिर में जब देश में लॉकडाउन शुरू हआ तब ऐसा लग रहा था कि राजनीतिक थोड़े समय तक स्थगित रहेगी। पार्टियां परिपक्वता दिखाएंगी और कोरोना संकट से निपटने के लिए एकजुट होकर प्रयास करेंगी। मध्य प्रदेश में सरकार गंवाने के बावजूद सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी की नेता सोनिया गांधी ने जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर लॉकडाउन का समर्थन किया तब यह भरोसा और मजबूत हुआ कि पार्टियां राजनीति से ऊपर उठ कर इस संकट का मुकाबला कर रही हैं।

तब एक के बाद एक कई घटनाएं हुई थीं, जिनसे लग रहा था कि पार्टियों के बीच दूरी कम हो रही है और हालिया इतिहास के सबसे बड़े संकट से निपटने के लिए एक राष्ट्रीय सरकार काम कर रही है। सोनिया ने चिट्ठी लिख सरकार का समर्थन किया तो कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता पी चिदंबरम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस लड़ाई का सेनापति बताया। कांग्रेस ने न्याय योजना लागू करने को कहा तो प्रधानमंत्री ने फोन करके पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से बात की और उनकी तारीफ की। फिर प्रधानमंत्री ने सभी विपक्षी नेताओं से भी बात की। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, जो अभी तक केंद्र की आयुष्मान भारत योजना नहीं लागू कर रहे थे उन्होंने इसे लागू कर दिया। सो, कुल मिला कर सद्भाव का माहौल दिख रहा था।

पर अब अचानक पार्टियों के बीच का सद्भाव खत्म हो गया है और लड़ाई शुरू हो गई है। एक साथ कई मोर्चे खुल गए हैं। पश्चिम बंगाल में केंद्रीय टीम भेजे जाने को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच टकराव हुआ है। तृणमूल कांग्रेस के नेताओं ने खुल कर केंद्र पर हमला बोला है। संघवाद के सिद्धांत का पालन नहीं करने का आरोप लगाया है। राज्य सरकारों ने केंद्र से भारी-भरकम आर्थिक पैकेज की मांग की है, जो नहीं मिलने पर जाहिर तौर पर केंद्र की आलोचना होगी।

उधर महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं सहित तीन लोगों की भीड़ द्वारा हत्या किए जाने पर अचानक सांप्रदायिक राजनीति तेज हो गई और भाजपा के नेता व उनके समर्थक महाराष्ट्र सरकार पर हमला करने लगे। कोरोना वायरस से सबसे ज्यादा प्रभावित महाराष्ट्र में सरकार के लिए यह एक अलग सिरदर्द हो गया। मुस्लिमों के साथ भेदभाव का मुद्दा उठा, जिस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर की राजनीति शुरू हो गई। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने सद्भाव छोड़ कर केंद्र सरकार पर हमला शुरू कर दिया। बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल और केरल आदि राज्यों में चुनाव के हिसाब से राजनीति होने लगी। जिस केरल को कोरोना से लड़ने के आदर्श के रूप में देखा जा रहा था उसके आंकड़ों पर सवाल उठाए जाने लगें। अमेरिकी कंपनी के साथ डाटा शेयरिंग को लेकर विवाद में फंसी केरल सरकार के खिलाफ सभी लेफ्ट विरोधी पार्टियां मुखर हो गई हैं। कुल मिला कर कोरोना वायरस से लड़ाई अभी अगले दौर में पहुंची भी नहीं कि भारत की पार्टियों ने इससे इतर अलग राजनीति शुरू कर दी। ऐसा लग रहा है कि सत्तारूढ़ दल को खुद ही इस तरह के सद्भाव वाली राजनीति पसंद नहीं है। इससे उसको नुकसान का अंदेशा रहता है।

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