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Monday, April 19, 2021
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पेट्रोल कीमतों पर सरकार का नया दांव

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पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमत पर अब आम लोगों को परेशान करने लगी है क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत में लगातार हुई बढ़ोतरी का असर अब बाकी जरूरी वस्तुओं की कीमत पर होने लगा है। महंगाई का दुष्चक्र चालू हो गया है। तभी केंद्र सरकार की परेशानी भी बढ़ रही है। पर मुश्किल यह है कि सरकार को अपने खजाने की चिंता है इसलिए वह कीमतें कम नहीं कर रही है। इसलिए अब लोगों को बरगलाने का नया दांव चला जा रहा है। सरकार ने सोशल मीडिया में पहले से यह प्रचार शुरू कराया हुआ था कि पेट्रोलियम उत्पादों पर राज्य भी बहुत कर लेते हैं तो उनको निशाना क्यों नहीं बनाया जा रहा है। अब सीधे सरकार की ओर से राज्यों को कठघरे में खड़ा करने का प्रयास शुरू हुआ है।

पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने वस्तु व सेवा कर यानी जीएसटी कौंसिल से अनुरोध किया है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। ध्यान रहे पेट्रोलियम उत्पाद और शराब को जीएसटी में नहीं शामिल किया गया है। जीएसटी की परिकल्पना के समय ही इसे अलग रखने का फैसला किया गया था क्योंकि पेट्रोलियम उत्पादों से केंद्र को और शराब से राज्यों को खूब आय होती है। राज्यों की आय का तो मुख्य स्त्रोत ही पेट्रोल-डीजल और शराब हैं। जुलाई 2017 में जब जीएसटी लागू हुआ तभी से इस बात की मांग हो रही है कि पेट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाया जाए। लेकिन अब तक इससे साफ इनकार करती रही केंद्र सरकार जीएसटी कौंसिल से अनुरोध कर रही है।

अगर पेट्रोलियम मंत्री सचमुच इस बात को लेकर गंभीर होते कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाए तो सार्वजनिक रूप से अनुरोध करने की बजाय वित्त मंत्री से मिल कर इसका प्रस्ताव बनवाते। राज्यों के साथ बात करते ताकि सहमति बनाई जा सके। आखिर देश के ज्यादातर राज्यों में तो भाजपा की ही सरकार है। अगर सत्तारूढ़ दल को लगता है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाना चाहिए तो वह इसके लिए अभियान चला कर राज्यों के साथ सहमति बनाने का प्रयास कर सकती है। उसकी बजाय धर्मेंद्र प्रधान जीएसटी कौंसिल से अनुरोध कर रहे हैं!

असल में इसका एकमात्र मकसद थोड़े समय तक और महंगाई को चलते रहने देने का है। अभी ध्यान भटकाने के लिए जीएसटी का शिगूफा छोड़ दिया गया। कौंसिल की बैठकों में आगे इस पर हो सकता है चर्चा भी हो। अगर सहमति नहीं बनती है तो केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री कह देंगे कि राज्यों में सहमति नहीं है या विपक्षी पार्टियों के शासन वाली सरकारें तैयार नहीं हो रही हैं। अगर वास्तव में पेट्रोलियम मंत्री पेट्रोल-डीजल को जीएसटी के दायरे में लाना चाहते हैं यानी राजस्व में कमी के लिए तैयार हैं तो उनको खुद से उत्पाद शुल्क में कटौती कर देनी चाहिए। अभी केंद्र सरकार एक लीटर कच्चे तेल की कीमत पर एक सौ फीसदी से ज्यादा शुल्क लेती है। उसे आधा भी कर दिया जाए तो कीमतों में 16 रुपए प्रति लीटर की कमी हो जाएगी।

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