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नीतीश के प्रचार का फायदा नहीं

भाजपा ने इस बार पूर्वांचल के वोटों के लिए नीतीश कुमार से भी प्रचार कराया। बिहार से सटे झारखंड में तीन महीने पहले ही दोनों पार्टियां अलग अलग लड़ी थीं। सोचें, झारखंड में जहां जनता दल यू का पुराना आधार रहा है और एक समय वहां उसके छह विधाय़क होते थे। राज्य में भाजपा की पहली सरकार जदयू के साथ ही बनी थी। वहां दोनों पार्टियों ने तालमेल नहीं किया। वहां दोनों अलग लड़े पर दिल्ली में दोनों का तालमेल हुआ और भाजपा ने नीतीश की पार्टी के लिए दो सीटें छोड़ीं। भाजपा ने बिहार दूसरी सहयोगी लोक जनशक्ति पार्ट के लिए भी एक सीट छोड़ी।

इसका मकसद पूर्वांचल का वोट सुनिश्चित करना था। इसी मकसद से नीतीश कुमार से दिल्ली में प्रचार कराया गया। दिल्ली में उनके साथ मंच पर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा भी रहे और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी रहे। इसके बावजूद पूर्वांचल का वोट भाजपा की बजाय आप के साथ गया। दिल्ली में पूर्वांचल वोट को ध्यान में रख कर ही भाजपा ने मनोज तिवारी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया था। इसी वोट को लुभाने के लिए अमित शाह ने बिहार में जाकर कहा कि भाजपा बिहार का चुनाव जनता दल यू के साथ ही लड़ेगी और नीतीश कुमार ही पार्टी का चेहरा होंगे। पर इनमें से कोई भी दांव कारगर नहीं हुआ।

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