भाजपा की राजनीति अपनाते केजरीवाल!

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल दूसरी बार चुनाव जीतने के बाद से ही राजनीतिक मसलों पर चुप हो गए हैं। वे राजनीतिक मुद्दों पर कुछ बोल ही नहीं रहे हैं। उलटे चुनाव प्रचार से लेकर नतीजे आने के दिन तक और उसके बाद के छह महीनों में केजरीवाल ने पूरी तरह से भाजपा की राजनीति की है। सरकार चलाने में वे वहीं कर रहे हैं, जो केंद्र सरकार उनको कह रही है और राजनीति ऐसी कर रहे हैं, जो भाजपा दशकों से करती आ रही है। तभी उनको वोट देने वाला बड़ा वर्ग उनसे नाराज है और यह नाराजगी सोशल मीडिया में जाहिर भी हो रही है। केजरीवाल को दोनों बार चुनाव जिताने वाला वहीं वर्ग था, जो पहले कांग्रेस के साथ था। पूरा अल्पसंख्यक समाज और मजदूरों या झुग्गी झोपड़ियों में रहने वाला वर्ग कांग्रेस के साथ था, जो उसे छोड़ कर केजरीवाल के साथ गया था। कोरोना वायरस के संकट की वजह से मजदूरों के पलायन और उनकी दुर्दशा ने केजरीवाल से उनका मोहभंग किया है। इसी तरह अल्पसंख्यक समुदाय का भी कई कारणों से मोहभंग हुआ दिख रहा है।

जैसे दिल्ली के दंगों के समय केजरीवाल का जो रुख रहा और जितनी तेजी से आम आदमी के पार्षद ताहिर हुसैन के खिलाफ कार्रवाई हुई उस पर तब भी सवाल उठे थे। फिर एनआरसी और एनपीआर को लेकर जो प्रदर्शन हुए या दिल्ली के दंगों के समय इधर-उधर जो प्रदर्शन हुए उनको लेकर जेएनयू और जामिया के छात्र-छात्राओं की गिरफ्तारी हो रही है और केजरीवाल या उनकी पार्टी इस पर कुछ नहीं बोल रही है। इस बीच खबर आई है कि दिल्ली के दंगों के मामले में दिल्ली सरकार ने तुषार मेहता और अमन लेखी को सरकार का वकील बनाया है। तुषार मेहता सॉलिसीटर जनरल हैं और अमन लेखी भाजपा के नेता हैं और नई दिल्ली की भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी के पति हैं। तभी ऐसा लग रहा है कि हनुमान चालीसा से शुरू करके केजरीवाल ने अब भाजपा की हार्डकोर हिंदुवादी राजनीति को अपना लिया है। कांग्रेस के नेता इससे खुश हैं। उनको अपना वोट बैंक वापस मिलता दिख रहा है।

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