अंबानी के घर ही जाएगा डीएचएफएल समूह!

इन दिनों कहीं भी, कुछ भी बेचा जा रहा है तो दो ही खरीदार दिखाई देते हैं- अंबानी और अडानी। खुदरा कारोबार का बिजनेस हो या रेल, हवाईअड्डा, लॉजिस्टिक कंपनी, टेलीविजन चैनल, जमीनें आदि कुछ भी बिक रहा है तो खरीदार ये ही दोनों हैं। ताजा मामला दिवान हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड यानी डीएचएफएल का है। यह कंपनी दिवालिया हो गई और लोन एनपीए हो गया तो नई बनाई गई एनसीएलटी व्यवस्था के तहत दूसरी कंपनियों की तरह इसे भी अपने खास लोगों को देने की पहल की गई। खबर है कि यह कंपनी मुकेश अंबानी के समधि आनंद पीरामल की कंपनी खरीद रही है। सोचें, पिरामल समूह खुद ही मुश्किल में है, उसे अपने कर्जों की किश्तें चुकानी मुश्किल हो रही है पर वह कर्ज में डूबी एक नई कंपनी खरीद रहा है। जाहिर है उसके लिए भारतीय बैंक ही उसे कर्ज देंगे।

बहरहाल, इस सौदे में अमेरिकी कंपनी ऑक्ट्री ने टांग अड़ा दी थी। कंपनी ने ज्यादा बड़ी बोली लगा दी थी। सो, कायदे से उसे यह कंपनी सौंप देनी चाहिए थी। पर चूंकि इसके खरीदार दूसरे थे, इसलिए सौदे की तारीखें बढ़ाई गईं और यह सुनिश्चित किया गया कि कंपनी पीरामल समूह को जाए। सो, 37 हजार 250 करोड़ रुपए में यह कंपनी पीरामल समूह को दे दी गई। इस कंपनी के ऊपर 80 हजार करोड़ रुपए का कर्ज था। इसमें से 90 फीसदी कर्ज सरकारी बैंकों का था। सो, 80 हजार करोड़ के कर्ज वाली कंपनी 37 हजार 250 करोड़ में बेचने का मतलब है कि बैंकों ने अपना 43 हजार करोड़ रुपया एक झटके में डुबो दिया। जिन बैंकों के 43 हजार करोड डूबे हैं वे ही बैंक इसकी वसूली के लिए फिर पीरामल समूह को कर्ज देंगे। इस तरह कर्ज वसूली के लिए कर्ज दे देकर बैंक एक बड़े दुष्चक्र में फंस गए हैं। य़ह तथ्य है कि पिछले छह साल में देश में 47 लाख करोड़ रुपए का कर्ज बट्टेखाते में डाला गया है।

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