पद की गरिमा और राजनीति का मोह

भारत में संवैधानिक संस्थाओं और राजनीति के बीच की दूरी धीरे धीरे कम होती जा रही है। उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों में राजनीति का मोह तेज से बढ़ रहा है। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आने या भाजपा की केंद्रीय राजनीति की कमान उनके हाथ में आने के बाद से यह प्रक्रिया तेज हुई है। पहले भी ऐसा होता था कि उच्च पदों पर बैठे लोग रिटायर होने के बाद राजनीति में आते थे पर वह अपवाद के तौर पर था। अब वह अपवाद मुख्य धारा बनता जा रहा है और विधायिका के अलावा लोकतंत्र के बाकी स्तंभों से जुड़े लोगों का राजनीति के प्रति रूझान बढ़ रहा है। इसे लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है।

यह इस सरकार में हुआ है कि सेना के सर्वोच्च पद से रिटायर हुए व्यक्ति ने हाथ के हाथ राजनीति ज्वाइन कर ली और लोकसभा में सांसद बने और केंद्र सरकार में मंत्री भी बन गए। जनरल वीके सिंह अपने विवादित कार्यकाल के बाद रिटायर होते ही भाजपा में शामिल हो गए। सोचें, सेना का प्रमुख रहे वीके सिंह सांसद और राज्य मंत्री बन कर खुश हैं, संसद में सवालों को जवाब दे रहे हैं।

ऐसे ही न्यायपालिका के प्रमुख रहे रंजन गोगोई रिटायर होते ही राज्यसभा के सांसद बन गए। उन्होंने अपने कार्यकाल में सरकार के पक्ष में अनगिनत फैसले दिए और राज्यसभा में जाने के लिए इंतजार भी नहीं किया। उनसे पहले एक और सुप्रीम मीलॉर्ड पी सदाशिवम राज्यपाल बन गए थे। ऐसे ही ‘महान’ पत्रकार लोग अपने जीवन भर के किए धरे पर पानी फेर कर राज्यसभा में जा रहे हैं और वहीं काम कर रहे हैं, जिसका जीवन भर विरोध किया। पुलिस के सर्वोच्च अधिकारी रिटायर होकर राजनीति में जा रहे हैं। बिहार के आंखफोड़ कांड से मशहूर हुए वीडी राम दूसरी बार भाजपा से सांसद बने हैं। यह न्यू इंडिया की नई व्यवस्था है।

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