दिल्ली के दंगों का नया नैरेटिव

दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों की अपनी अपनी तरह से सारे लोग व्याख्या कर रहे हैं। पहली नजर में यह एक प्रयोग लग रहा है। दोनों पक्ष इसे प्रयोग बता रहे हैं। विपक्षी पार्टियों का कहना है कि यह दंगा सत्तारूढ़ दल की ओर से प्रायोजित था इसलिए पुलिस मूकदर्शक बनी रही। दूसरी ओर सरकार से जुड़े कई लोग कह चुके हैं कि सरकार को अस्थिर करने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के ऐन समय यह दंगा कराया गया। गुजरात दंगों से दिल्ली दंगों की तुलना करने वाले लोग बता रहे हैं कि गुजरात मॉडल आ गया है और देश भर में इसका फायदा भाजपा लेना चाहती है।

पर सामान्य सांप्रदायिक दंगों से होने वाले चुनावी नफा-नुकसान के नजरिए से इसकी व्याख्या से इतर एक नया नैरेटिव फैल रहा है और उसकी सूचना बिहार से दिल्ली आ रही है। बिहार में इस साल के अंत में चुनाव होने वाले हैं। दिल्ली प्रवासियों में बड़ी आबादी बिहार के लोगों की है। सो, कायदे से दिल्ली के दंगों को लेकर बिहार में उबाल आना चाहिए था। पर वहां सब कुछ ठंडा है। असल में दिल्ली दंगों में मारे गए लोगों की प्रोफाइल ने एक बड़े वर्ग को प्रभावित किया है। कूड़ा बीनने वाले, रिक्शा चलाने वाले, जूते सिलने वाले के दंगों में मारे जाने की खबर ने आम गरीब को बेचैन किया है। उसे लग रहा है कि दंगों का फायदा चाहे जिसे हो, जान उसकी जानी है। संभवतः यही कारण है कि एक समूह आईबी में काम करने वाले अंकित शर्मा व दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतनलाल की मौत और डीसीपी अमित शर्मा के घायल होने की घटना पर ही ज्यादा जोर दे रहा है।

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