त्रिवेदी के इस्तीफे में ममता का क्या कसूर! - Naya India
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त्रिवेदी के इस्तीफे में ममता का क्या कसूर!

दिनेश त्रिवेदी ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है। पिछले लोकसभा चुनाव में वे हार गए थे, जिसके बाद पहला मौका मिलते ही अप्रैल 2020 में ममता बनर्जी ने उनको राज्यसभा में भेजा। त्रिवेदी ने 1980 में राजनीति शुरू की थी और कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे। कांग्रेस की 10 साल की राजनीति में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ तो वे जनता दल में चले गए और जनता दल ने उनको 1990 में गुजरात से राज्यसभा में भेजा। वे 1998 में तृणमूल कांग्रेस से जुड़े। उसके दो साल बाद यानी 2002 से ममता बनर्जी ने उनको लगातार सांसद बनाए रखा। पहले 2002-2008 में छह साल के लिए राज्यसभा में भेजा, फिर 2009 से 2019 के बीच वे बैरकपुर सीट से लोकसभा सांसद  रहे और 2019 में जब लोकसभा का चुनाव हार गए तो ममता ने उनको अप्रैल 2020 में राज्यसभा में भेजा। ममता ने उनको केंद्र में मंत्री भी बनवाया।

यानी गुजराती माता-पिता की संतान दिनेश त्रिवेदी को अपने राजनीतिक जीवन में जो कुछ भी मिला वह ममता बनर्जी ने दिया। त्रिवेदी का बंगाल से सिर्फ इतना जुड़ाव था कि उनके पिता वहां एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे और उन्होंने कॉलेज की पढ़ाई बंगाल से की थी। वे देश बंटवारे के बाद पाकिस्तान से आए गुजराती माता-पिता की संतान हैं। उनका जन्म दिल्ली में हुआ। शुरुआती पढ़ाई हिमाचल प्रदेश में हुई और कॉलेज की पढ़ाई के बाद वे अमेरिका चले गए, जहां पढ़े और वहीं नौकरी की। राजनीति शुरू की तो मोटे तौर पर दिल्ली में बैठ कर ड्राइंग रूम की राजनीति की। अब उनके इस्तीफे को लोग ममता बनर्जी के लिए झटका बता रहे हैं! उनका इस्तीफा ममता बनर्जी के लिए कोई झटका नहीं है। क्योंकि धारणा के स्तर पर दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे का जो असर हो पर जमीनी स्तर पर बंगाल की राजनीति में उनका कोई असर नहीं है। इसलिए उनका इस्तीफा ममता के लिए सबक है कि उन्हें सोच समझ कर लोगों को राजनीति में आगे बढ़ाना चाहिए।

दिनेश त्रिवेदी को पता है कि उन्होंने ऐन चुनाव से पहले इस्तीफा देकर ममता बनर्जी को धोखा दिया है इसलिए ममता को अटैक करने की बजाय वे उनकी तारीफ कर रहे हैं और कह रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस अब ममता की नहीं रह गई है। यह अपने कदम को न्यायसंगत ठहराने के लिए एक पतली गली से निकलने का प्रयास है। उनके इस्तीफे की टाइमिंग चुनाव के लिहाज से तो अहम है उससे ज्यादा अहम है उन्होंने ऐसे समय में इस्तीफा दिया है, जब उपचुनाव नहीं हो सकता है। थोड़े दिन पहले उन्होंने इस्तीफा दिया होता तो अभी उपचुनाव होता और ममता किसी अन्य व्यक्ति को 2026 तक के लिए राज्यसभा में भेजती। लेकिन अब उपचुनाव विधानसभा चुनाव के बाद ही होगा।

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