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राजरंग| नया इंडिया| monopoly of communication companies संचार कंपनियों के एकाधिकार

संचार कंपनियों के एकाधिकार का नुकसान

monopoly of communication companies

सात-आठ साल पहले यूपीए सरकार के समय देश में आधा दर्जन से ज्यादा संचार कंपनियां थीं। भारती-एयरटेल, वोडाफोन, आइडिया और रिलायंस जियो के अलावा टाटा डोकोमो, यूनिनॉर, एमटीएस, एयरसेल जैसी कई कंपनियां सेवा दे रही थीं और इनके अलावा दोनों सरकारी कंपनियां बीएसएनएल और एमटीएनएल भी थीं। लेकिन बाद में चार-पांच कंपनियां बंद हो गईं और वोडाफोन-आइडिया का विलय हो गया। अब ले-देकर तीन निजी कंपनियां- एयरटेल, वोडाफोन-आइडिया और जियो बची हैं। देश के संचार बाजार पर इन तीन कंपनियों का एकाधिकार हो गया है। monopoly of communication companies

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इसका एकाधिकार का नुकसान अब नागरिकों को दिखने लगा है। देखने में ऐसा लग रहा है कि तीनों कंपनियां एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं लेकिन असल में तीनों मिल कर जनता को लूटने की योजना पर काम कर रही हैं। पिछले दिनों एक एक करके तीनों कंपनियों ने अपने रेट बढ़ा दिए हैं। पहले एयरटेल ने अपने प्रीपेड प्लान्स में 20 से 25 फीसदी का इजाफा किया। इसके बाद वोडाफोन-आइडिया ने भी अपने प्लान्स की दर 25 फीसदी बढ़ाई और अब जियो ने भी 25 फीसदी का इजाफा कर दिया है। आने वाले दिनों में पोस्टपेड प्लान्स की दर बढ़ेगी और फिर यह चक्र चलता रहेगा क्योंकि लोगों के पास इन तीन के अलावा कोई विकल्प नहीं है और न बाजार में कोई वास्तविक प्रतिस्पर्धा है।

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