क्या राहुल को युवा नेताओं से खतरा?

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की बगावत के बाद जो कहा गया वहीं बात राजस्थान में सचिन पायलट की बगावत के बाद कही जा रही है। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस पार्टी में किसी भी युवा नेता को आगे नहीं बढ़ने दिया जाएगा क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी नहीं चाहतीं कि कोई भी तेजतर्रार नेता राहुल गांधी के लिए चुनौती बने। ऐसे ही जानकार लोग पहले कहते थे कि सोनिया जान बूझकर प्रियंका को राजनीति में नहीं ला रही हैं क्योंकि उनके आने से राहुल का कद कम हो जाएगा। यानी कुछ समय पहले तक प्रियंका ही राहुल के लिए चुनौती थीं और अब सिंधिया, पायलट या इस तरह का कोई और नेता चुनौती बन गया है, जिसकी एकमात्र राजनीतिक पूंजी पिता या परिवार का नाम है।

इस राजनीतिक नैरेटिव को और बेहतर ढंग से समझना हो तो लोकसभा का पिछला चुनाव देख सकते हैं, जब लालू प्रसाद ने बिहार की प्रतिष्ठा वाली बेगूसराय सीट पर राजद का उम्मीदवार उतार दिया था, जिसकी वजह से सीपीआई के कन्हैया कुमार हार गए थे। तब भी कहा गया था कि लालू ने जान बूझकर कन्हैया को हरवाया है क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि तेजस्वी के सामने विपक्ष की ओऱ से कोई नया नेता उभरे। चाहे कांग्रेस के बारे में सोचने वाले हों या राजद के बारे में वे इन पार्टियों की बुनियादी राजनीतिक बुनावट को ही नहीं समझ रहे हैं।

कांग्रेस या राजद और राजद जैसी अस्मिता की राजनीति करने वाली पार्टियों में परिवार का नेतृत्व ही वह खूंटा है, जिससे पार्टी बंधी होती है। कुछ लोग हमेशा वह खूंटा तोड़ कर या बंधन तोड़ कर बाहर निकलते हैं या चुनौती पैदा करते हैं पर वे उनका विकल्प नहीं होते हैं। सोचने की बात है कि जब शरद पवार या ममता बनर्जी जैसे नेता सोनिया गांधी का विकल्प नहीं हो सके तो सिंधिया, पायलट या कोई और नेता राहुल का विकल्प कैसे हो सकता है?

राहुल के लिए चुनौती मान कर किसी युवा नेता को कांग्रेस में अगर रोकने की सोच होती तो सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, मिलिंद देवड़ा, जितेंद्र सिंह, तुषार भाई चौधरी आदि नेता केंद्र सरकार में मंत्री नहीं बने होते। कांग्रेस ने आज से दस साल पहले इन लोगों को केंद्र में मंत्री बनाया था। अब सवाल है कि सिंधिया को मध्य प्रदेश में या पायलट को राजस्थान में मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया गया तो सिंधिया यह सवाल जिस पार्टी में गए हैं उसके नेताओं से भी पूछ सकते हैं कि जब उनकी दादी जनसंघ और भाजपा के शीर्ष पांच नेताओं में शामिल थीं तब भी पार्टी ने उनको मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया था? असल में मध्य प्रदेश में राजस्थान की तरह किसी राज घराने के व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाना राजनीतिक रूप से आत्मघाती हो सकता है। इसी तरह सचिन के प्रति राहुल गांधी के पूरे सद्भाव के बावजूद वे मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे तो वह राजस्थान की सामाजिक-राजनीतिक मजबूरियों की वजह से हुआ और कांग्रेस में अभी उनके लिए रास्ते बंद नहीं हुए थे।

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