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सहयोगियों के दबाव में कांग्रेस

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यूपीए में शामिल कांग्रेस की सहयोगी पार्टियां भले कांग्रेस पार्टी की बात नहीं सुनती हैं लेकिन कांग्रेस को उनको बात सुननी और माननी पड़ती है। तभी कांग्रेस गरीब सवर्णों को मिले 10 फीसदी आरक्षण के मसले पर अपनी पुरानी राय से पीछे हट रही है। कांग्रेस ने संसद में इस बिल का विरोध नहीं किया था और पिछले दिनों जब सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर मुहर लगाई तब भी कांग्रेस ने इसकी स्वागत किया। कांग्रेस ने एक कदम आगे बढ़ कर इसका श्रेय भी लिया। पार्टी की ओर से कहा गया कि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते इसकी शुरुआत की थी और उनकी पहल पर ही यह कानून बना है। लेकिन अब कांग्रेस पार्टी अपनी इस राय से पीछे हट रही है और पुनर्विचार की बात कर रही है।

कांग्रेस पार्टी ने अपनी दो सहयोगियों- डीएमके और राजद के दबाव में अपनी राय बदली है। ये दोनों पार्टियां खुल कर इसका विरोध कर रही हैं। बताया जा रहा है कि डीएमके ने जब इसका विरोध किया तो तमिलनाडु के कांग्रेस नेताओं ने भी पार्टी आलाकमान के सामने इस कानून को लेकर विरोध दर्ज कराया। डीएमके और राजद दोनों का कहना है कि वे ईडब्लुएस आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं लेकिन चाहते हैं कि यह आरक्षण सिर्फ सवर्णों को नहीं मिले, बल्कि हर जाति और समूह के गरीबों को मिले। यानी ओबीसी, एससी और एसटी को मिल रहे जातीय आरक्षण के अलावा भी इन समूहों को ईडब्लुएस कोटे में आरक्षण मिले। कांग्रेस के नेता इस पर विचार के लिए तैयार हो गए हैं। बताया जा रहा है कि सोनिया गांधी की अध्यक्षता में हुई रणनीतिक समूह की बैठक में इस पर विचार हुआ और संसद में यह मुद्दा उठाने का फैसला हुआ। संसद के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस पार्टी इस पर चर्चा की मांग करेगी और इसमें सभी जातियों को शामिल करने की मांग भी रखेगी।

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