पुलिस और एजेंसियों की विफलता!

दिल्ली पुलिस ने आंदोलन कर रहे किसानों के साथ तीन दिन वार्ता की थी। तीन दिन की वार्ता के बाद पुलिस ने किसानों को ट्रैक्टर परेड निकालने की अनुमति दी थी। इस अनुमति के एक दिन बाद पुलिस ने रूट्स की जानकारी दी। इसका मतलब है कि पुलिस ने तमाम तरह की छानबीन करने और हालात का मुआयना करने के बाद ट्रैक्टर परेड की इजाजत दी थी। सवाल है कि इतनी छानबीन और बारीकी से सारी चीजों को देखने के बाद भी पुलिस और खुफिया एजेंसियों को अंदाजा क्यों नहीं हुआ कि क्या होने वाला है?

कितने ट्रैक्टर और कितने किसान रैली में शामिल होने वाले हैं, इस बेसिक बात की जानकारी कैसे पुलिस और खुफिया एजेंसियों को नहीं हुई? पुलिस ने पांच हजार ट्रैक्टर के साथ रैली की इजाजत दे थी लेकिन पहले दिन से मीडिया में खबर आ रही थी एक लाख से ज्यादा ट्रैक्टर होंगे, फिर पुलिस ने उस हिसाब से तैयारी क्यों नहीं की थी? यह पहला मौका नहीं है, जब पुलिस और एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं और कोई कांड हो गया! सीमा पर घुसपैठ से लेकर दिल्ली के पिछले साल हुए दंगों और अब किसानों की ट्रैक्टर रैली में हुए उपद्रव तक दर्जनों घटनाएं हैं, जिनके बारे में पुलिस और एजेंसियों को कानों कान खबर नहीं लगी।

भाजपा से जुड़ा एक पंजाबी अभिनेता और उसके करीबी लोग सोमवार की रात को सिंघू बॉर्डर पर छह घंटे तक लोगों को भड़काते रहे, क्या वहां पुलिस या खुफिया एजेंसी का कोई व्यक्ति नहीं था? सिंघू बॉर्डर पर भाजपा समर्थक दीप सिद्धू और गैंगेस्टर से नेता बने लक्खा सदाना ने मंच पर कब्जा किया और छह घंटे तक किसानों को संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं के खिलाफ भड़काते रहे। उन्हें रिंग रोड पर रैली निकालने के लिए उकसाते रहे और इन्हीं लोगों ने अगले दिन लाल किले पर निशान साहिब व किसान यूनियन का झंडा फहराया। अगर इन्हें रोका नहीं जा सका तो यह किसकी विफलता है?

जानकार सूत्रों का कहना है कि पुलिस, खुफिया एजेंसियां और सरकार के शीर्ष मंत्री सब गलत सूचनाओं के आधार पर मुगालते में बैठे रहे कि कोई बड़ा आंदोलन नहीं होने वाला है। किसानों के आंदोलन के बारे में पहले से सरकार ने यह धारणा बना कर रखी है कि ये थोड़े से लोग हैं, जिनको आढ़तिए या कांग्रेस के नेता या कुछ बाहरी तत्व भड़का रहे हैं। सरकार ने असल में कभी इस आंदोलन को एक बड़े, लोकतांत्रिक व कानूनसम्मत आंदोलन के तौर पर देखा ही नहीं है और न अपनी गलती मानी। इसी वजह से अब तक सरकार गच्चा खा रही है। अब भी सरकार का पूरा प्रयास इस आंदोलन को गलत ठहराने का ही है।

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