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सरकार ने मंशा साफ कर दी

केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों पर अपनी मंशा साफ कर दी है। प्रधानमंत्री के गुजरात के कच्छ में दिए भाषण, केंद्रीय कृषि मंत्री के अंग्रेजी के एक अखबार को दिए इंटरव्यू और किसानों के साथ वार्ता में शामिल केंद्रीय मंत्री और दूसरे केंद्रीय मंत्रियों के बयानों से साफ हो गया है कि सरकार न तो कृषि विधेयकों को रद्द करेगी और न उनमें कोई बड़ा बदलाव करेगी। प्रधानमंत्री और मंत्रियों के बयान जो बातें स्पष्ट हुई हैं वह ये हैं- ये कानून बड़ा सुधार हैं, इनसे किसानों का भला होगा, किसान आंदोलन एक बड़ी साजिश है, किसानों को गुमराह किया जा रहा है, इसमें नक्सली और माओवादी शामिल हो गए हैं और इस आंदोलन के पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ भी है।

अब सोचें, इसके बाद क्या गुंजाइश बचती है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कहा कि दिल्ली के आसपास किसानों को गुमराह करने की बड़ी साजिश रची जा रही है। इसका मतलब है कि किसानों का आंदोलन कोई आंदोलन नहीं है, यह एक साजिश है। इसके बाद कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार को 303 सांसदों का बहुमत तमाशा देखने के लिए नहीं मिला है। उन्होंने अंग्रेजी के अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए इंटरव्यू में कहा कि सरकार को 303 का बहुमत मिला है सुधार करने के लिए और वह सुधार करेगी। बहुमत की ताकत का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने कहा  कि तीनों कानून बड़े कृषि सुधार हैं और इनसे किसानों का भला होगा।

किसानों के साथ वार्ता में शामिल केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि किसान आंदोलन वामपंथियों, माओवादियों के कब्जे में चला गया है और किसान उनसे निकलें तो सरकार हर मुद्दे पर उनसे बात करने को तैयार है। यह बात केंद्र के कई और मंत्रियों ने भी कही है। एक मंत्री राव साहेब दानवे ने यह भी कहा कि आंदोलन के पीछे चीन और पाकिस्तान का हाथ है। सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के मुताबिक केंद्रीय मंत्री का यह बयान सरकार का बयान माना जाएगा। सरकार की इस सोच को देखते हुए नहीं लगता है कि वह कृषि कानूनों में कोई बड़ा बदलाव करेगी।

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