किसानों का सुप्रीम कोर्ट में जाना ठीक नहीं था! - Naya India
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किसानों का सुप्रीम कोर्ट में जाना ठीक नहीं था!

क्या किसान आंदोलन के अंदर फूट पड़ गई है? क्या किसान जिन तीन केंद्रीय कृषि कानूनों का विरोध कर रहे हैं, उन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किसान संगठनों ने साझा तौर  पर किया या एक संगठन ने अपने मन से जाकर याचिका दायर कर दी? किसान संगठन इस पर चुप हैं लेकिन ऐसा लग रहा है कि एक गुट का सुप्रीम कोर्ट जाना आंदोलन को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा हो सकता है। गौरतलब है कि भारतीय किसान यूनियन (भानु) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी है। इस गुट के नेता भानु प्रताप सिंह किसान आंदोलन में बहुत सक्रिय नहीं थे। तभी अनेक लोगों को इस याचिका को लेकर संदेह है। एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में पहले से दायर की गई है, जिसमें किसान आंदोलन खत्म करने की अपील की गई है।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को अभी चुनौती देने का कोई औचित्य नहीं है क्योंकि यह कानून ठीक है या नहीं है या देश को इसकी जरूरत है या नहीं, यह बात सुप्रीम कोर्ट में नहीं तय हो सकती है। सुप्रीम कोर्ट इसकी वैधता या संवैधानिकता की जांच कर सकता है। किसी कानून की या सुधार की जरूरत है या नहीं, यह तय करना सरकार का काम है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में कोई राहत हासिल होने की उम्मीद कम है। दूसरे, इस किस्म के ज्यादातर मामले में सर्वोच्च अदालत का नजरिए वहीं रहा है, जो सरकार का होता है। अदालत सरकार के कामकाज में ज्यादा दखल नहीं दे रही है। इस लिहाज से भी किसान आंदोलन को इससे फायदा नहीं होने वाला है।

ऊपर से नुकसान यह है कि अगर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार हो जाती है और सरकार व किसान संगठनों को नोटिस जारी हो जाता है तो सरकार को एक बहाना मिल जाएगा कि अब मामला न्यायालय के अधीन है तो वह कोई फैसला नहीं कर सकती है। यानी अगर कानूनों के गुण-दोष पर अदालत में विचार शुरू हो जाता है तो किसानों को सरकार से कुछ हासिल होने की उम्मीद खत्म हो जाएगी। फिर जो होगा सो, अदालत से होगा। इससे भी किसान आंदोलन बिखर सकता है।

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