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एक्जिट पोल का कोई मतलब नहीं

पश्चिम बंगाल में आखिरी चरण के मतदान के बाद 29 अप्रैल को आए एक्जिट पोल के नतीजों में बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच लगभग बराबरी का मुकाबला दिखाया गया है। लेकिन यह यकीन करने लायक नहीं है। हालांकि यह नहीं कहा जा सकता है कि यह गलत ही होगा या सही ही होगा, लेकिन यह तय है कि यह आकलन किसी वैज्ञानिक विधि पर आधारित नहीं है। इसका कारण यह है कि एक्जिट पोल का सैंपल साइज बहुत छोटा है। दूसरे, आखिरी चरण के मतदान का पूरी तरह से खत्म भी नहीं हुआ था कि चैनलों ने अनुमान बताने शुरू कर दिए। जाहिर है यह अनुमान पहले सात चरण की वोटिंग पर आधारित है। तीसरे, किसी चैनल के पास वोट का प्रतिशत नहीं है। ध्यान रहे वोट प्रतिशत से सीटें तय होती हैं, सीटों की संख्या बताने से वोट प्रतिशत का पता नहीं चलता है।

एक्जिट पोल के नतीजों के बेमतलब होते जाने का कारण सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियां और उन्हें दिखाने वाले मीडिया समूहों का इतिहास है। पिछले कई वर्षों से मीडिया समूह और एजेंसियां इतने पूर्वाग्रह के साथ सर्वेक्षण करती हैं कि लगभग हर बार गलत साबित होती हैं। पिछले साल के अंत में बिहार विधानसभा चुनाव में सट्टा बाजार के हिसाब से देश के मीडिया समूहों ने राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस एलायंस को पूर्ण बहुमत से ज्यादा सीटें मिलने की भविष्यवाणी की थी लेकिन नतीजे इसके बिल्कुल उलट आए। उससे पहले दिल्ली, झारखंड, हरियाणा, महाराष्ट्र और लोकसभा चुनाव तक में एक्जिट पोल के नतीजे वास्तविक नतीजों से बहुत दूर रहे थे।

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