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मिनी स्ट्राइक पर भाजपा की चुप्पी!

दो राज्यों में विधानसभा चुनावों के लिए होने वाले मतदान से ठीक एक दिन पहले भारतीय सेना ने सीमा पर पाकिस्तान के संघर्षविराम उल्लंघन का जवाब दिया। सोमवार को मतदान होना था और रविवार को भारतीय सेना ने तोप और आर्टिलरी गन से जोरदार हमला किया और बताया जा रहा है कि आतंकवादियों के कई शिविर और पाकिस्तानी सेना की चौकियां नष्ट कर दीं। सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का कहना है कि दस पाकिस्तानी सैनिक और कई आतंकवादी मारे गए हैं।

सेना की इस कार्रवाई की तुलना 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक और इस साल बालाकोट के एयर स्ट्राइक से नहीं की जा सकती है। पर यह भी एक मिनी स्ट्राइक ही था। पर हैरान करने वाली बात है कि भाजपा ने इस पर पूरी तरह से चुप्पी साधे रखी। बताया जा रहा है कि पार्टी की ओर से सभी प्रवक्ताओं और नेताओं को यह निर्देश दिया गया कि वे इस पर बयान नहीं देंगे। पार्टी को लग रहा था कि अगर भाजपा के नेताओं ने बयान दिया या श्रेय लेने का प्रयास किया तो कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों को इसे राजनीतिक मुद्दा बनाने का मौका मिलेगा।

तभी न तो सरकार की ओर से और रक्षा मंत्रालय की ओर से और न भाजपा की ओर से कोई बयान दिया गया। सिर्फ सेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने बयान दिया। इस चुप्पी से भाजपा ने सेना की कार्रवाई को पूरी तरह से अराजनीतिक दिखाने का प्रयास किया। अगर पार्टी इस पर बयान देती या श्रेय लेती तो आम लोगों में भी यह संदेह पैदा होता कि कहीं राजनीतिक फायदे के लिए तो सेना का इस्तेमाल नहीं हो रहा है?

बहरहाल, हाल के दिनों में यह दूसरा मामला है, जब राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मसले पर भाजपा ने चुप्पी साधी। पहला मामला अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का है। 16 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद भूमि विवाद में सुनवाई पूरी की और फैसला सुरक्षित रखा। उस दिन मंदिर के पक्षकारों और दूसरे हिंदू संगठनों की ओर से खूब बयानबाजी हुई। साधु संतों और अयोध्या आंदोलन से जुड़े रहे संगठनों ने इस पर बयान दिया। मंदिर निर्माण की तैयारियां बताईं। पर भाजपा ने बयान नहीं दिया।

बताया जा रहा है कि उस दिन भी भाजपा के सभी प्रवक्ताओं को निर्देश दिया गया था कि इस मसले पर बयान न दें। पार्टी के प्रवक्ताओं और संघ विचारक के तौर पर टेलीविजन बहसों में शामिल होने वाले कई नेताओं को पत्रकार फोन करते रहे पर वे या तो फोन लाइन पर नहीं आए या इस पर बयान देने से इनकार कर दिया। तब भी भाजपा ने बहुत सावधानी से सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई को अराजनीतिक दिखाने का प्रयास किया। वैसे भी पहले से ही कई नेताओं ने बयान देकर इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया है। ऐसे नेताओं को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद चुप रहने की नसीहत दी थी।

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